बसे रहो मेरे प्रेम
एक समुद्र मेरे भीतर उतरा
एक नदी बहने लगी धीरे धीरे
आसमान के जितने रंग थे
सब उतर आये
शरद का चाँद कई बार पिघला
मेरे जिस्म पर उग आये प्यार के नर्म घास
मेरी उम्र से ही नहीं
मेरे कई जन्मों से भी बड़ा है प्रेम
उन सभी हसीन चीज़ों से जिससे दुनिया बनी
और उस खुदा से भी...
जिसके होने का दंभ उससे बड़ा है
प्रेम करना उतना ही सहज है
जितना जिंदगी का होना
जितना पृथ्वी का होना
समुद्रों,नदियों और असंख्य तारों का होना
ओ हरीतिमा
ओ नीलिमा
ओ लालिमा
ओ मेरे प्रेम बसे रहो बसे रहो ....... निवेदिता
एक समुद्र मेरे भीतर उतरा
एक नदी बहने लगी धीरे धीरे
आसमान के जितने रंग थे
सब उतर आये
शरद का चाँद कई बार पिघला
मेरे जिस्म पर उग आये प्यार के नर्म घास
मेरी उम्र से ही नहीं
मेरे कई जन्मों से भी बड़ा है प्रेम
उन सभी हसीन चीज़ों से जिससे दुनिया बनी
और उस खुदा से भी...
जिसके होने का दंभ उससे बड़ा है
प्रेम करना उतना ही सहज है
जितना जिंदगी का होना
जितना पृथ्वी का होना
समुद्रों,नदियों और असंख्य तारों का होना
ओ हरीतिमा
ओ नीलिमा
ओ लालिमा
ओ मेरे प्रेम बसे रहो बसे रहो ....... निवेदिता
" .......आसमान के जितने रंग थे
जवाब देंहटाएंसब उतर आये
शरद का चाँद कई बार पिघला
मेरे जिस्म पर उग आये प्यार के नर्म घास ...... "
अच्छी कविता है।
इस पंक्ति को इस तरह लिखें --
'मेरे जिस्म पर उग आयी प्यार की नर्म घास'