मंगलवार, 15 अप्रैल 2014

शुक्रिया 

मैं शुक्रिया अदा करना चाहती हूँ
उन सबों का जिन्होंने मुझे प्रेम दिया
या वे जो मुझ से प्रेम करते हैं
वे अभागे है जो प्रेम नहीं कर पाते
वे भी जो प्रेम को दिलों के तहखाने में बंद रखते हैं
रौशनी उसके पार नहीं जाती
हवा उन्हें छू नहीं पाती
ना बारिश
ना ओठ
यह सोचना डरावना है कि ...
प्रेम नहीं उगेगा धरती पर
भेड़िये वापस आ गए हैं
दुनिया पीछे की ओर जा रही है
जब जलते मकानों से हवा गुजरती है
मैं कहती हूँ ये बुरा सपना है
सो जाओ मेरे प्रेम
टूटे पखों के तकिये पर
नहीं चाहती देखो भय से कातर आखें
खिड़की के बाहर प्राथना में जुड़े हाथ
उजाड़ देश व लहू के टुकड़े के बीच
उस बच्ची की उजली हंसी देख सकते हो
जो अभी अभी माँ की छाती से लगी गहरी नींद में है
क्या तुम चूम सकते हो उसके होठों से लगे सफ़ेद झागदार दूध
तपती सफेद दोपहर में मलवे पर ऐसे ही सो रही थी वह
पीले फूलों वाली घास पर तुम भी तो थे पड़े हुए
दहकते चाकू से जब समुद्री चिड़िया के पंख कटे गए
प्रेम क्या तब भी थे तुम उसके पास
मुझे समझाओ क्या मतलब है तुम्हारे होने का
घृणा और प्रेम
तुम अभी भी धड़कते हो
जब एक दैत्य भड़कीली भाषा में
जयजयकार करता है
भयावह समवेत चीख के बाद
उसके हाथ स्त्री के स्तन पर रेंगते हैं
शर्म और अपमान के बाद भी वह
ईश्वर से प्राथना नहीं करती
वह जानती है इस दुनिया में ईश्वर सबसे अकेला है
उसके और अँधेरे के बीच प्रेम ही है
जो जन्मता है हर बार
शाम के आसमान पर सुलगते हुय सितारों की तरह
 
 
Nivedita की बेहद संवेदनशील और मौजूं कविता.....और आगे देखें

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