किताबों की दुनिया
किताबों की दुनिया से मेरा परिचय पिता ने कराया। मुझे याद है की मैं सातवीं में पढ़ती थी। पंख लगने शुरू हुए थे। मेरी एक दोस्त थी गायत्री। उनदिनों स्कूल में गुलशन नंदा की किताब लेकर आती। हम समूह में उन किताबों का मजा लेते। मुझे इतना चस्का लगा की घर में कोर्स की किताबों में रख कर उन किताबों को पढ़ती . एक दिन पापा ने देख लिया . वे दुखी हुए . दूसरे दिन जाकर मेरे लिए कई किताबें लेकर आये . गोर्की ,प्रेमचंद ,तोलस्टॉय ,रविन्द्र नाथ ठाकुर . इन किताबों ने मेरी दुनिया बदल दी . पहली बार जाना कि किताबों का जीवन में क्या महत्व है . किताब से दोस्ती पापा ने ही कराया . अकसर जब वे फुर्सत में होते तो हम सब भाई बहनों को किताबें पढ़ कर सुनाते . टेगोर को तो पापा से ही जाना . पापा बंगला जानते हैं . उनदिनों अक्सर बंगला में टेगोर और दूसरे बंगला के लेखकों को पढ़ कर सुनाते . कई बार ऊब होती थी .आज लगता है की अगर पापा इस तरह पाठ नहीं करते तो शायद एक सुन्दर भाषा को हम सीख नहीं पाते . इस सुन्दर भाषा से भी पापा ने ही परिचय कराया . मेरी दुनिया में किताबें ने जितना रंग भरा उतना ही पापा ने भी . वे प्यार करने वाले, जीवन भरे पिता हैं . हमारे जीवन में वे इसी तरह बने रहें आमीन .......
