मंगलवार, 14 जुलाई 2015


उन पत्रकारों  के नाम  जो  मारे  गए 


निवेदिता

1.
जब कोई दरवाजे पर देता  है दस्तक
माँ भागती  है
किवाड़ खुलते
ही  उसकी चाल धीमी 
हो जाती है 
जानती है अब वह लौट कर कभी नहीं  आएगा 
सब कुछ वही है
उसका कमरा
टेबुल पर पड़ा लैम्प
मुड़े –मुड़े कागजों का ढेर
कैमरा , माईक
पेंसिल, जिसे वह अक्सर अपनी उंगलियों में दबाकर
लिखता हुआ नज़र आता था
माँ धीमे कदमों  से आकर उसके पास खड़ी हो जाती थी
रे इतनी देर तक क्या लिखता रहता है
वह मुस्कुराता और माँ को भर लेता बाँहों में
तू चिंता क्यों करती है
माँ जानती है 
रात उतर आती है कागजों पर
कागज से बड़े -बड़े दैत्य निकल आते हैं 
टी वी पर शब्द उछलते
एक और घोटाला
आकाश विदीर्ण हो रहा है
सूर्य दहक  रहा है
पृथ्वी गहरे सुरंगो में ढल गयी है
हवा ने देश के चिथेड़े –चिथड़े किये
माँ ने देखा उसके लिखे शब्द
बह रहे हैं
बहती रहो नदियां
उसकी आवाज की नमी ख़त्म न हो
अनन्त पानियों की जगह वह लौट आएगा
सब कुछ के विरुध्य
दुनिया की तमाम स्याही
के साथ
वह फिर
लिखेगा
कागज पर
फिर कागज जलाये जायेंगे
उसी चौक पर जहाँ
उसे जला दिया गया
माँ ने हवा में उड़ते  चिंगारियों को दामन में समेट लिया
उसके आंचल लहरा रहें  हैं
आसमान तक  फूंट रहीं हैं
लाल लाल लपकती आग

 २.
तुम जानते थे कि
सच की खोज जोखिम भरा है
तुम जानते थे धरती सपनो के साथ जीवित है
तुम मिट्टी में तारीख दर्ज  करने की कोशिश में लगे थे
परत-परत खुलता गया
और खून से दामन भींगते गए
माँ जो अक्सर डर जाती थी
रात –रात आकर तुम्हारे सिराहने बैठी रहती
आसमान पर अपने आंचल की तम्बू टांग देती
जाने कितने जतन
किये
पर रोक नहीं पाई हत्यारे की लपलपाती जीभ
उसने अपने आंसू पोछ  लिए
और वह लड़ रही है,
जहाँ बच्चे खेलते हैं
जहाँ अँधेरी गलियों में जीवन सरकता है
जहाँ रात की पाली से लौटते है कामगार
वह तुम्हारे लिखे कागज पर लिख रही है
शब्द
एक पुराने ग्रह की भाषा
संघर्ष

 
नहीं हम नहीं भूलेंगे 
हत्यारे की आखें
हम नहीं भूलेंगे उनकी शांत चीख
हमारे लोगों के कडवे आंसू
हम नहीं भूलेंगे इस
असंवेदनशील समय को
मुझे याद है 
तुम्हारी हंसी
तुम्हारा प्यार
याद है तपती गर्मी में बिना बादलों के
मारे – मारे  फिरना
जहाँ घुली बर्फो पर सूरज की पीली रौशनी पसरती है
पलाश और गुलमोहर
बरस पड़ते थे
पेड़ो की  शाखों पर फिसलते पानी की तहरीर
नीला समंदर
और रात की गोद , हमारा डूब जाना
तुम्हारी यादें
हमें यकीं दिला रहीं हैं
अभी सब ख़त्म नहीं हुआ है
अभी प्यार जिन्दा है
 जिन्दा हैं  सपने 
अभी लड़ना बांकी है
बांकी है  जिन्दगी  के राग ....

रविवार, 21 सितंबर 2014





हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है 
पाखी के सम्पादक ने सितम्बर अंक के अपने सम्पादकीय में चालीस साल की स्त्रियों के प्रेम , उनके विश्वास और विश्वासघात तथा तथाकथित तौर पर उनमें साहस के अभाव सहित अभिव्यक्ति के नये आयाम के साथ ज्यादा उन्मुक्त होती स्त्रियों को अपना विषय बनाया है . ४० साल की यह उम्र सीमा समझ से परे है . वैसे पुरुषों के लिए स्त्रियों की उम्र और उनका कौमार्य बड़ा पुराना विमर्श -विषय रहा है . १९वी शताब्दी में तिलक और रानाडे आदि विवाह के लिए ९ साल या ११ साल की बहस में फंसे थे या फिर किस विधवा की शादी हो , जैसे विषय में . यानी बहस यह थी कि पति -संसर्ग कर चुकी विधवा का पुनर्विवाह हो या नहीं . पाखी के सम्पादक भी उसी कड़ी में विमर्श कर रहे हैं ,  शर्मिला इरोम  , अरुंधति राय , शोभना भारतीय , इंदिरा नुई , सुस्मिता सेन , विद्या बालन के समय में. या उस समय में जब स्त्रियाँ अपनी कामनाओं और इच्छाओं के साथ सक्रिय हैं . निवेदिता पाखी के विवादित सम्पादकीय के परिप्रेक्ष्य से अपनी बात कह रही हैं . आप भी आमंत्रित हैं . )

प्रेम भारद्वाज को पढ़ती रही हूं । मुझे उनको पढ़ना अच्छा लगता है। अच्छा इसलिए नहीं कि वे मित्र हैं, इसलिए कि लिखना एक कला है। उंनकी अभिव्यक्ति लेखन -कला के साथ जीवंत होती है . काला  जितनी उनके बाहर है उतनी भीतर। हम यह उम्मीद करते हैं कि कला के प्रति गहरा अनुराग रखने वाला इंसान स्त्री मुद्दों पर भी उतना ही संवेदनशील होगा ,जितना मनुष्यता को लेकर। सीमोन कहती हैं, '  स्त्री जन्म नहीं लेती स्त्री गढ़ी जाती है।'  मुझे लगता है पुरुषों के बारे में भी यह कहा जाना चाहिए कि ' हर पुरुष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है.'

पाखी के संपादकीय‘ चांद पर हूं...मगर कब तक’ में प्रेम भारद्वाज ने जो कुछ लिखा उससे अंधेरा और गहरा हुआ है। एक बार फिर स्त्री लहुलूहान हुई है। मैं नहीं जानती की जिन 40 पार की स्त्रियों का जिक्र संपादकीय में किया गया है वे किस दुनिया की स्त्री हैं? जहां प्रेम भी प्रेम जैसा नहीं है। टाइम पास है। सिनेमा का मध्यांतर है। जहां मौज मस्ती के साथ पाॅपकार्न खा लेने भर का ही वक्त है।  प्रेम भारद्वाज की यह स्त्री छलना है, पर पुरुष गामिनी  है। अपने घर के दायरे को सुरक्षित रखकर प्रेम करती है, मजा लेती है। यह वह स्त्री नहीं है, जो प्रेम के लिए मर जाती है या मार दी जाती है, जिसने घरती पर पांव जमाने के लिए खुरदरी जमीन पर अपनी मेहनत से फसल उगायी है। जिसने अपने हिस्से के आसमान के लिए खून से भरे शोक  के फर्श  पर सदियां बितायी है।

ये कौन स्त्री है? किस वर्ग की? किस दुनिया की जिसे अपने गोपन कक्ष में प्रेम करने की आजादी है। जहां वह प्रेमी के साथ जीती है,पति के साथ सोती है? और यह बेचारा पुरुष कितना मासूम, प्रेम में मरने वाला, जान देने वाला है। राम सजीवन जैसा पुरुष किस दुनिया में रहता है ? काश  कि किसी स्त्री के जीवन में इतने संवेदनशील  मर्द होते!


सब्जेक्शन आॅफ विमेन में जाॅन स्टुअर्ट मिल कहते हैं-‘पुरुष अपनी स्त्रियों  को एक बाध्य गुलाम की तरह नहीं बल्कि एक इच्छुक  गुलाम की तरह रखना चाहते हैं,सिर्फ गुलाम नहीं, बल्कि पंसदीदा गुलाम। इसलिए उनके मस्तिष्कों को बंदी बनाए रखने के लिए उन्होंने सारे संभव रास्ते अपनाए हैं।’

हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए। सच तो यह है पराजित  नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता  से स्त्री को दबाया गया। यह हम नहीं कह रहे हैं यह स्त्री का इतिहास बताता है। क्या कोई भी गुलाम इतने लंबे समय के लिए गुलाम रहा है जितनी की स्त्री? क्या यह स्थापित करने की कोशिश नहीं है कि अच्छे पुरुष की निरंकुश सत्ता में चारों तरफ भलाई,सुख और प्रेम के झरने बह रहे हैं। जिसकी आड़ में  वह हर स्त्री के साथ मनमाना व्यवहार कर सकता है। उसकी हत्या तक कर सकता है और थोड़ी होशियारी बरत कर वह हत्या कर के भी कानून से बचा रह सकता है। वह अपनी सारी दबी हुई कुंठा अपनी पत्नी पर निकाल सकता है। जो अपनी असहाय स्थिति के कारण न पलट कर जबाव दे सकती है, न उससे बचकर जा सकती है। अगर यकीन न हो तो हर रोज मारी जा रही स्त्रियों के आंकड़े को उठा कर देख लें।


40 के पार की औरतोें अगर प्रेम में इतनी ही पकी होतीं तो हर रोज रस्सी के फंदे से झूलती खबरें अखबारों के पन्ने पर नजर नहीं आती। सच तो यह है कि उसकी पूरी जिन्दगी अपने घर को बचाने में चली जाती है। घर उसके जीने का केन्द्र है। उसके हंसने, बोलने, रोने का। इसलिए उसने घर को अपना फैलाव माना। उसे सींचा। पर इसके पेड़ का फल पुरुषों ने ही खाया। उसे राम सजीवन जैसा न कभी प्रेमी मिलता है न एकनिष्ठ पति। फिर भी वह अनैतिक है। पुरुष को नैतिक और  स्त्री को अनैतिक बनाने की मानसिकता के पीछे यह बताना है कि पुरुष नैतिक रुप से श्रेष्ठ है। नैतिकता और अनैतिकता को लेकर हमेशा  से अतंर्विरोध रहा है। जिसका नायाब उदाहरण है टाॅलस्टाय का उपन्यास अन्ना कैरेनिना। अनैतिक अन्ना विश्व  उपन्यास की सबसे यादगार चरित्रों में से है।  टाॅलस्टाय के नैतिकता संबंधी विचारों को उसकी कला ध्वस्त कर देती है।



जिस समाज में प्रेम अपराध है उस समाज में स्त्री को इस बात की छूट कहां कि वह प्रेम से भरी दिखे। वह प्रेम के लिए जिए। वह प्रेम कविता लिखे। पता नहीं प्रेम भारद्वाज को वैसी स्त्रियाँ  कहां दिख गयीं । जिस फेसबुक को स्त्री के लिए किसी दरीचे के खुलने  जैसा मान रहे हैं  उसके खुलेपन  से इतने आहत क्यों? फेसबुक पुरुषों का भी  चारागाह है। जहां वे शिकारियों  की तरह ताक में बैठे रहते हैं कि जाने कौन किस चाल में फंसे। दरअसल ये पूरी बहस ही बेमानी है। प्रेम को किसी अलग सदंर्भ में नहीं देखा जा सकता। हमारी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक और लैंगिक बुनावट तय करती है कि कौन सा समाज किन मूल्यों के साथ जीता है। इसी समाज में ईरोम भी है और अरुणा राय भी।


सवाल उठता है कि हम स्त्री को किस तरह से देखते हैं। एक आब्जेक्ट के रुप में या मनुष्य के रुप में ? अगर हम मनुष्य की तरह देखेंगे तो हमें तीसरी कसम का हीरामन ही याद नहीं आयेगा हीराबाई के प्रति भी हमारी गहरी संवेदना होगी। देवदास शराब में डूब कर मर जाता है पारो जिन्दगी से लड़ती है, पलायन नहीं करती। अगर लैेला नहीं होती तो आज मजनूं नहीं होता। न लैला कहती , ' मेरा कब्र वहीं बनाना ,जहां मैं पहली बार उससे मिली थी। उससे कहना कि मेरी कब्र पर आयें,और सामने क्षितिज की ओर देखे.  वहां मैं उसका इंतजार कर रही हूंगी। ' और जिन आंखों में मजनूं के सिवा कोई समाया नहीं था, वे आंखें हमेशा  के लिए बंद हो गयी।



' कागा सब तन खाइयो
चुनि-चुनि खाइयो मास
दुइ अंखियां मत खाइयो
 पिया मिलन की आस।' ...

दरअसल प्रेम यही है। इससे इतर कुछ नहीं। वह 40 की पार औरतें हों या फिर 16 साल की मासूम उम्र,  जिसे न तो सामाजिक निषेध और न दुनियाबी रस्मों रीवाज छू पाते हैं।

बुधवार, 20 अगस्त 2014


किताबों की दुनिया 

किताबों की दुनिया से मेरा परिचय पिता ने कराया।  मुझे याद है की मैं सातवीं में पढ़ती थी। पंख लगने शुरू हुए थे।  मेरी एक दोस्त थी गायत्री। उनदिनों स्कूल में गुलशन नंदा की किताब लेकर आती। हम समूह में उन किताबों का मजा लेते। मुझे इतना चस्का लगा की घर में कोर्स की किताबों में रख कर उन किताबों को पढ़ती . एक दिन पापा ने देख लिया . वे दुखी हुए . दूसरे दिन जाकर मेरे लिए कई किताबें लेकर आये . गोर्की ,प्रेमचंद ,तोलस्टॉय ,रविन्द्र नाथ ठाकुर . इन किताबों ने मेरी दुनिया बदल दी . पहली बार जाना कि  किताबों का जीवन में क्या महत्व है . किताब से दोस्ती पापा ने ही कराया . अकसर जब वे फुर्सत में होते तो हम सब भाई बहनों को किताबें पढ़ कर सुनाते . टेगोर को तो पापा से ही जाना . पापा बंगला जानते हैं  . उनदिनों अक्सर बंगला में टेगोर और दूसरे बंगला के लेखकों को पढ़ कर सुनाते  . कई बार ऊब होती थी .आज लगता है की अगर पापा इस तरह पाठ  नहीं करते तो शायद एक सुन्दर भाषा को हम सीख  नहीं पाते  . इस सुन्दर भाषा से भी पापा ने ही परिचय कराया . मेरी दुनिया में किताबें ने जितना रंग भरा उतना ही पापा ने भी .  वे प्यार  करने वाले, जीवन  भरे पिता हैं . हमारे जीवन में वे इसी तरह बने रहें आमीन .......   

बुधवार, 6 अगस्त 2014

काठमांडू में सात देशों की महिला पत्रकारों के एक सम्मलेन से लौट कर वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता इन  देशों की महिला पत्रकारों के  समान संघर्षों की कहानी  स्त्रीकाल के पाठकों से साझा कर रही हैं. )

पिछले पांच दिनों तक पूरी दुनिया हमारी थी । हमने सरहदों की सीमा पार की। मुल्क की दीवारों को पार किया । हमसब मिले काठमांडू में। अलग-अलग भाषा,संस्कृति  के बावजूद हम मुहब्बत के रंग में डूबे रहे। हमने जाना पूरी दुनिया की पत्रकारिता में क्या कुछ चल रहा है। पाकिस्तान,बंगलादेश ,अफगानिस्तान समेत कुल सात देशों  की महिला पत्रकारों ने पत्रकारिता और उससे जुडे मसलों पर बात की ।इन देशों  से आयी महिला पत्रकारों ने बताया कि दुनिया तक खबरें पहुंचाने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ती हैं उन्हें। पिछले दस सालों में सिर्फ पाकिस्तान में 100 से ज्यादा पत्रकार मारे जा चुके हैं। भय और आतंक के बीच महिलाएं काम करती हैं। वे हिंसा का सामना करती हैं। उनकी कलम पर पहरे लगें हैं। जुबा पर मुहर लगी है। बमों और गोलियों के बीच पत्रकारिता करने वाली महिला पत्रकार कहती हैं कि 'दुनिया में वह गोली कहीं नहीं बनी जो सच को लगे।'
पर वो वहां मात खा जाती हैं जहां महिला होने की वजह से एक खास तरह की मानसिक और शारीरिक हिंसा क्षेलती हैं।  दुनिया की पत्रकारों के लिए पत्रकारिता से बडी चुनौती है लैंगिक विभेद। ये पत्रकार जो खबरों से लड़ती हैं, जो दूर-दराज गांवों,शहरों कस्बों और महानगरों से खबरें ले आती हैं, उन सब को लैंगिक विभेद का समाना करना पड़ता है। पाकिस्तान की सना मिर्जा ने बताया कि कई अखबार महिलाओं को नहीं रखते । यह एक तरह की अघोषित नीति है। पेशावर की महिला पत्रकार आॅफिस से काम नहीं करती। उन्हें हर जगह तालिबान से खतरा रहता है। वे नहीं चाहते औरतें मीडिया में काम करें। इसलिए वे छुपकर अपने घरों से खबरें भेजती हैं। सरकार के पास महिलाओं की सुरक्षा को लेकर कोई नीति नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि इस दौर में पत्रकारिता के मूल्य बदले हैं, तेवर बदले हैं।

वैश्वीकरण  मीडिया पहले से ज्यादा आक्रामक  बनाया है। मनोरंजन से लेकर खबर परोसने के तरीके बेहद आक्रमणकारी और विखंडनकारी है। पूंजी के इस खेल में मीडिया के लिए महिला पत्रकार भी बाजार का हिस्सा है। बाजार बनाए रखने के लिए उसे खूबसूरत एंकर व रिपोटर्र चाहिए। खबरों से ज्यादा मीडिया का ध्यान इस बात पर रहता है कि उनके चैनल की एंकर की शक्ल  इस बाजार को लुभा सकती है या नहीं। सना कहती हैं मेरे लिए एंकरिंग बड़ी चुनौती है। हम रोज वैसी खबरों से गुजरते हैं जो दिल दहलाने वाली होती है। उन स्थितियों में एक एंकर के लिए जरुरी होता है कि वह अपनी बात इस तरह से कहे कि किसी की भावना आहत नहीं हो। पाकिस्तान में महिला हिंसा की खबरें काफी बढ़ी है पर उन खबरों को जगह नहीं मिल पाती।  उन खबरों को जगह मिले,खबरे संवेदनशील  तरीके से लिखे जाएँ  और न्याय के पक्ष में आवाज उठाए इसके लिए भी पाकिस्तान की पत्रकारों को  मीडिया के भीतर दबाव बनाना पड़ता है।


                                                                  निवेदिता के दूसरे आलेखों को  स्त्रीकाल में पढ़ने के लिए क्लिक 
                                                                   करें : ( जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार )
                                                                           ( यह चुप्पी खतरनाक है )

 अफगानिस्तान  के हालात और भी खराब हैं। मैकिया मुनीर ने बताया कि पत्रकारों पर हमले होते हैं। आतंकवादी संगठनों का दवाब रहता है। कई बार ऐसे संगठन पत्रकारों का इस्तेमाल अपने लिए करते हैं। महिला पत्रकारों को पुरुषों के मुकाबले कम पैसे मिलते हैं। महिला पत्रकारों ने कहा कि उनके सामने इस बात का दवाब रहता है कि न्यूज बुलेटिन को अधिक से अधिक आकर्षक व बिकाउ बनाएं। बाॅडी लैगवेज उत्तेजक हों और पोशाक  पारदर्शी  हों। दरअसल पूंजीवाद के लिए हर चीज कामोडिटी है। वह पुराने मिथकों को तोड़ता है और नए मिथकों को गढ़ता है। दुनिया के सभी देशों  में कमोवेश  महिलाएं लैंगिक विभेद की शिकार हैं। आज भी महिला पत्रकारों की संख्या कम है। सभी देशों में शीर्ष  पर पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या कम है ।  महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले कमतर आंका जाता है।

श्रीलंका की पत्रकार दिलरुकशी,आॅस्टेलिया की जेना,बंगालादेश  की नाडिया, हिन्दुस्तान की लक्ष्मी और नेपाल की निर्मला समेत सभी महिला पत्रकारों ने महसूस किया कि कार्यस्थल  पर यौन उत्पीड़न के अधिकांश  मामलों में महिलाओं को न्याय नहीं मिलता। ऐसे कई मामले सामने आए पर न्याय नहीं मिला।
खबरों को लेकर भी विभेद है। महिलाओं को राजनीतिक,अपराध,वाणिज्य,प्रशासन जैसे बीट नहीं दिये जाते हैं। एक पत्रकार ने बताया कि सालों तक उसे धर्मगुरुओं के प्रवचन पर रिपोर्ट बनाना पड़ा।यह माना गया कि मीडिया की कार्य संस्कृर्ति महिला पत्रकारों के विरोध में खड़ी है। उनके उठने, बैठने से लेकर उनकी निजी  जिन्दगी में भी ताक-झांक की कोशिशें  होती रहती हैं। महिला पत्रकारों की स्थायी नियुक्ति एक बड़ा मसला है। अधिकांश  महिलाएं अस्थायी नियुक्ति की वजह से असुरक्षित हैं। उन्होंने पाया कि अखबारों में शहरी,ग्रामीण,गरीब,दलित औरतों के जिन्दगी के संघर्षों  को कम जगह मिलती है पर मीडिया में मनोरंजन के नाम पर विघटन,अविश्वास ,परिवार विभाजन,विवाहेतर संबंध जैसी खबरों को ज्यादा तरजीह मिलती है। दरअसल मीडिया का मूल स्वर स्त्री विरोधी है। मीडिया इसी पितृसत्तात्मक समाज से निकला है। इसलिए मीडिया में महिला पत्रकारों के सामने कई तरह की चुनौतियां है। उन्हें लड़ना ही होगा अपने हिस्से के आसमान के लिए।

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

निवेदिता

निवेदिता
निवेदिता पेशे से पत्रकार हैं. सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. हाल के दिनों में वाणी प्रकाशन से एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे’ के साथ इन्होंने अपनी साहित्यिक उपस्थिति भी दर्ज कराई है.निवेदिता से niveditashakeel@gamail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है.
( तहलका में यौन शोषण के मामले के विपरीत इंडिया टी वी की एंकर तनु शर्मा की आत्महत्या  के प्रयास  के मामले में मीडिया की खौफनाक चुप्पी हमसब ने देखी. आज भी आप गूगल करें तो आपको भड़ास, फर्स्ट पोस्ट और बी बी सी जैसे कुछ पोर्टल / ब्लॉग को छोड़ कर किसी मीडिया के द्वारा इसकी खबर की इंट्री नहीं मिलती है. भड़ास ने इसे मुहीम की तरह चलाया. इस आलेख में तनु शर्मा की आत्महत्या के प्रयास के सन्दर्भ से मीडिया सहित दूसरे क्षेत्रों में कामकाजी महिलाओं की कठिनाइयों की चर्चा कर रही हैं वरिष्ठ पत्रकार और स्त्रीकाल के सम्पादन मंडल की सदस्य निवेदिता. )

बाजार केंद्रित  मीडिया के लिए इंडिया टीवी की युवा महिला एंकर तनु शर्मा की आत्म हत्या की कोशिश कोई मायने नहीं रखती .  यह  वह  मीडिया है , जो  दूसरों के जख्मों पर हाथ रखती है पर अपने भीतर पड़े मवाद को छुपाये फिरती है। पिछले तीस सालों से  पत्रकारिता करते हुए मैंने पत्रकारिता के मूल्यों को इस तरह गिरते नहीं देखा। मेरे जैसे पत्रकार के लिए ये अवसाद के क्षण हैं। हम कैसी पत्रकारिता करना चाहते हैं, हम कैसी दुनिया बनाना चाहते हैं ! 

तनु की घटना अकेली घटना नहीं है। तहलका के प्रकरण से अभी हम उबरे भी नहीं हैं कि एक और हादसे ने पत्रकारिता को शर्मसार किया है। क्या हमारा समाज इस बात का इंतजार कर रहा है कि लड़कियां मौत के अंधेरे में घकेल दी जाएं, फिर हम शोक मनाएं। मैं कहना चाहती हूं दुनिया की तमाम लड़कियों से-इन अंधेरों से लड़ो...तुम हो तो पत्रकारिता के मूल्य बचे रहेंगे ,  तुम हो तो दुनिया के होने के मायने बने रहेंगे। अभी बहुत सारे जुल्मों का हिसाब बाकी हैं।

मैं यह बात पूरे यकीन के साथ कह सकती हूं कि कोई लड़ाई बेकार नहीं जाती। ये मेरे अनुभव हैं। मैं लगभग दो सालों तक एक मीडिया हाउस के खिलाफ लड़ती रही। यह लड़ाई सम्मान और बराबरी के अधिकार की लड़ाई थी। यह जरुरी नहीं है कि महिलाओं पर होने वाली हर हिंसा यौन हिंसा ही हो। और कई तरह के प्रसंग हैं , जहां वह हिंसा का सामना करती है। उसके हंसने,बोलने, कपड़े पहनने, उसके चरित्र जैसे तमाम प्रसंगों को लेकर उसे हर रोज कई तरह के अशोभनीय स्थितियों का सामना करना पड़ता है।

बिहार से निकलने वाले एक प्रमुख दैनिक अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को अपनी नौकरी इसलिए गंवानी पड़ी क्योंकि उसने इस तरह की बातों का सख्त विरोध किया। एक न्यूज एजेंसी में काम करने वाली महिला पत्रकार ने ऐसे अशोभनीय दृष्यों का वर्षो सामना किया, जब उनके कुछ सहकर्मी सिर्फ अंडरवीयर पहन कर काम करते थे। दिन में भी शराब का दौर चलता था। बिहार के एक अंग्रजी अखबार में काम करने वाली महिला पत्रकार को रोज किसी सेक्सी और कम कपड़े पहने किसी महिला अदाकारा की तस्वीर निकाल कर अखबार में लगाना होता था। जब उसने इस तरह के काम नहीं देने का अनुरोध किया तो उससे कहा गया कि यह उसके काम का हिस्सा है उसे करना ही होगा। ऐसे हजारों मामले हैं जिसपर खुल कर बातें नहीं होती, क्योंकि हम अपने ही घर में फैले अंधेरे का समाना नहीं करना चहते।

निःसंदेह   ऐसी घटनाओं ने देश  के मीडिया को कठघरे में खड़ा किया है। ये सवाल  उठने लगे हैं कि क्या महिला पत्रकार यहां भी सुरक्षित नहीं है ,दरअसल इन तमाम घटनाओं को सामाजिक, आर्थिक,  राजनीतिक व लैंगिक परिप्रेक्ष्य  मंम देखना होगा। यह भी देखना होगा कि मीडिया का चरित्र पिछले ढ़ाई दशकों में कितना बदला है!
बॉलीवुड  की तरह इसमें भी मटमैली पूंजी का वर्चस्व बढ़ा है। सत्ता, ताकत व पूंजी के इस खेल में मीडिया नाक तक डूबी है। जब पूंजी मटमैली हो तो जाहिर है उसे बनाये रखने के लिए गुनाह होंगे ही। सत्ता प्रतिष्ठान में सीधे हस्तक्षेप की महत्वाकांक्षा भी बढ़ी है। मीडिया खुद बाजार का हिस्सा है और बाजार की ताकत को बनाये रखने के लिए वह सबकुछ करता है। बाजार ने स्त्री को सिर्फ देह माना है। बाजार केन्द्रित मीडिया भी स्त्री की  देह को ही भुनाती है। वह चाहे मनोरंजन के नाम पर हो या खबर परोसने के नाम पर। यह सब वह पूरी आक्रमकता से करता है। टी.वी चैनेलों पर दिखाए जाने वाले लगभग सभी हिन्दी धारावाहिकों की  कथा वस्तु के मुख्य स्वर विघटन, अविश्वास , परिवार- विभाजन, विवाहेत्तर संबंध के इर्द-गिर्द ही घूमता रहते हैं । यह दुर्भाग्य है कि मीडिया में जनपक्षीय खबरों को उतनी तरजीह नहीं मिलती जितनी वैसी खबरों को जिससे बाजार बनता है। जो लोग बगैर  किसी समझौता के संस्थान में टिके रहते हैं उनपर ऐसा मानसिक दबाव बनाया जाता है कि उसे आत्महत्या का रास्ता अपनाना पड़ता है। कारपोरेट घरानों के हाथों बिकी हुई मीडिया ने तनु से वह सब करने का दबाव बनाया, जो किसी भी लड़की के लिए अपमानजनक है।

सवाल बनाता  है कि तनु के साथ हुए इस हादसे के लिए कौन जिम्मेवार है, इस मुश्किल  दौर में आखिर आदमी किस पर भरोसा करे ! क्या ये मान लिया जाय की इस नपुंसक समय में मनुष्य बने रहना मुमकिन नहीं है। यह कैसा दंभ है जब एक स्त्री के शरीर और मन पर हमला करने वाला इन्सान पूरे गुरुर के साथ वहीं बना रहता है और एक पत्रकार को अपने को बचाने के लिए आत्महत्या का सहारा लेना पड़ता है। क्या अब भी हम रजत शर्मा जैसे पत्रकारों की वकालत करेंगे, रजत शर्मा और तेजपाल जैसे गुनहगार बचे रहेंगे तो पत्रकारिता में और अंधेरा बढ़ेगा, पत्रकारिता लहुलूहान होगी।

 तनु का मामला अकेला मामला नहीं है। ऐसी कई लड़कियाँ न्याय के अभाव में या तो दम तोड़ देती हैं या हथियार डाल देती हैं। क्या हुआ तरुण तेजपाल के मामले में, इस बात की चितां किसे है कि इन संस्थानों से लड़ने वाली ये लड़किया कितनी अकेली पड़ गयी हैं। कानून की पकड़ ढ़ीली है। उन तमाम यौन अपराधियों के लिए कानून को और पुख्ता व धारदार होना होगा। वह मामला चाहे किसी न्यायधीश  से जुड़ा हो या किसी राजनेता से। ये सारे आचरण इस बात का सबूत है कि हम स्त्री को उसकी यौनिकता से बाहर नहीं देखते। जस्टीस गांगुली ने अपने इंटर्न के साथ जो कुछ किया या नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह एक महिला की निजता में दखल दिया, उसकी जासूसी करायी, क्या इसके लिए इन दोनों को सजा नहीं होनी चाहिए. ये घटनाएं कहती हैं किहमारे समाज को कानून को नये सिरे से परिभाषित किए जाने की जरुरत है। निर्भया मामले के बाद वर्मा कमिटी की सिफारिशों  में एक हद तक महिलाओं के उपर हो रही हिंसा को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश की गयी, पर सरकार ने उसे भी पूरी तरह नहीं अपनाया है। यह समय की मांग है कि कानून अपने पुराने खोल से बाहर निकले । अगर ऐसा नहीं हुआ तो  मुक्त, निष्पक्ष व निर्भीक न्यायपालिका की परिकल्पना बेमानी होगी ।

रही बात  पत्रकारिता की , उसके और बुरे दिन आने वाले हैं। बुरे वक्त से लड़ रही महिलाओं के लिए अब काम के दरवाजे बंद होने वाले हैं। यह उन लोगों के लिए सुनहरा मौका है ,जो स्त्री को घर की दीवारों में ही दफन करना चाहते हैं। दुनिया के आंकड़े बताते हैं कि कामकाजी महिलाओं के लिए काम के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। हमारे देश  की कामकाजी महिलाओं की तादाद में लगातार गिरावट है। महिलाओं के उपर हो रही हिंसा का ग्राफ यह बताता है कि हर तीन मिनट में एक महिला किसी न किसी तरह की हिंसा की शिकार है। नेशनल क्राइम रिकार्ड  ब्यूरो के मुताबिक हर 20 मिनट पर एक महिला के साथ बलात्कार होता है। सिर्फ दिल्ली के आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक साल के भीतर कुल 66 प्रतिशत महिलाएं कम से कम दो से पांच बार यौन हिंसा की शिकार हुई हैं। ऐसे बुरे समय से लड़ने के लिए उन लोगों को सामने आना होगा जो चाहते हैं, कि पत्रकारिता बची रहे। जो इस दागदार दुनिया में भी मूल्यों के साथ जीना चाहते हैं।
निवेदिता को यहाँ भी पढ़ें : ( क्लिक करें : जब जरा गरदन झुका ली देख ली तस्वीरें यार

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

मेरे प्यार

सारी रात
सोया पड़ा रहा चाँद
मेरे सिराहने
भोर तक जागती रही मैं …
कितने सारे पंख उड़े
कितनी नदियाँ भर गयी लबालब
पुराने गाढ़े शहद से
भर गया मुख
मेरी देह
धरती की गोलाई में सिमट गयी
असंख्य दिल हवा में धड़के
मेरे प्यार
हमने पाया
एक दूसरे को
वैसे ही
जैसे आसमान
जैसे जलपोत
जैसे मेघ
जैसे तुम्हारे चुम्बनों से भीगे मेरे होठ
निवेदिता

सोमवार, 23 जून 2014

 तुम साथ होते हो 

तुम साथ होते हो
तो दुनिया
अपनी सी होती
नींद
ख्वाब लिए आती है
ख्वाब मेरी रातों में रंग भरते
रात उतरती है
नर्म-नर्म
मुलायम
सपने लिए और मैं झुकती हूँ पृथ्वी को चूमने !
पृथ्वी है तो सपने उगते रहेंगे
सपने हैं तो प्रेम बसा रहेगा हमारे दिलों में....निवेदिता