गुरुवार, 3 जुलाई 2014

मेरे प्यार

सारी रात
सोया पड़ा रहा चाँद
मेरे सिराहने
भोर तक जागती रही मैं …
कितने सारे पंख उड़े
कितनी नदियाँ भर गयी लबालब
पुराने गाढ़े शहद से
भर गया मुख
मेरी देह
धरती की गोलाई में सिमट गयी
असंख्य दिल हवा में धड़के
मेरे प्यार
हमने पाया
एक दूसरे को
वैसे ही
जैसे आसमान
जैसे जलपोत
जैसे मेघ
जैसे तुम्हारे चुम्बनों से भीगे मेरे होठ
निवेदिता

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