बुधवार, 7 नवंबर 2012

इरोम के नाम 
सरकारी अधिकार   रैली से जिस दिन अख़बारों का पन्ना रंगा हुआ था ठीक उसी दिन इरोम के संघर्ष के 12 साल पूरे हुए . इरोम की आवाज भले ही मीडिया तक नहीं पहुंची हो पर इरोम के लिए बिहार की बच्चियों का दिल धरक  रहा था .तनया ,कुहू , मैत्रीय ,निशु ,आयुषी ने इरोम के लिए दिनभर उपवास रखा . यह पहली बार नहीं था जब पूर्वोत्तर  के लिए बिहार का दिल धरका .इंसान और इंसानियत के हक़ में जो आवाज पिछले 12 सालो से गूंज रही है वह आवाज सरकार तक नहीं पहुंचती। . इस गूंगी  बहरी सरकार से हम और उम्मीद ही क्या कर सकते हैं .और इस मीडिया  से भी  नहीं जिसके पास जमीर नहीं है . ये कविता इरोम के लिए ...............

तमाम भूख गुजर जाती है 
और खाने का स्वाद राख में बदल जाता है 
मै हूँ  एसी जमीन पर जहाँ बसंत नहीं है 
जहाँ नहीं होते सपने 
पिघलते सूरज के आस पास 
गर्म सलाखों के बीच मैं धरती को कंबल की तरह लपेट लेती हूँ
की बची रहे मेरे पूर्वजों की आवाज 
इन तमाम निरुत्साह चीजों के बीच
हरी भरी धरती पर सपनो की फसल लहलहाती है 
तुम मेरे सपनो को कैद नहीं कर सकते
लरजते महाव्योम तक 
नर्म गीली मिट्टी तक
मुक्त हुयी मौजो  तक
मेरी आवज की गूंज तुम्हें सुनना ही होगा 
दुनिया का कोई  कैद खाना नहीं छीन  सकता मुक्ति का स्वप्न .
इसलिए मुझे मत बताओ की 
मुक्ति के स्वप्न से बरा है कोई स्वप्न ..........निवेदिता 


 मुझे रौद नहीं सकते 

रविवार, 4 नवंबर 2012

unlock the mystery

ah, love could thou and i with fate conspire
to grasp this sorry scheme of things entire,
would not we shatter it to bits-and then
re-mould it nearer to the heart;s desire........omar khayyam