मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

बादल

मिलना चाहती थी स्याह बादलों से
जो बरस पड़ते हैं
इस बिखरती हुयी आधी रात को
खाली खुले छत पर
चाँद की रौशनी में
बुलाते हैं रात भर
बुलाते हैं
नीले और आसमानी बादल ...
कहते हैं तुम्हारे शहर में आयें हैं
पीली मिट्टी के रास्तों
मोहगनी के घने पेड़ से गुजरकर
तुम्हारी गली में बरस रहे हैं
वे बड़े नसीब वाले हैं राहगीर
जो कायनाती आसमान का दीदार करते हैं
तारों के उजास में
बादलों के सीने से लिपटे
खुली छत पर भीगते रहते
भीगते जाते ......nivedita
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सोमवार, 7 अक्टूबर 2013

we din

♦ निवेदिता
टना। गरमी के मौसम के आखिरी दिनों में और पतझड़ के सारे मौसम में गंगा भरी-भरी ही रहती। क्लास के बाद घड़ी – दो घड़ी सांस लेने हमलोग उसके किनारे बैठ जाते थे। गंगा की कल-कल सुनते हुए आंखें बंद किये पड़े रहते। दरख्तों से घिरा पटना कॉलेज के पीछे का वह हिस्सा हमलोगों की आरामगाह था। चमकीली घूप में भी गंगा को छूकर गुजरने वाली हवा गीली-गीली होती थी। शाम को हवा में खुनकी होती और आकाश खुला होता। जाड़ों में पेड़ों के ऊपर सफेद घुंध के फाहे तिरते रहते। मेरी आखिरी बस पांच बजे होती। इसलिए चार बजे तक का समय हमारे पास होता। उन दिनों पटना विश्वविद्यालय के पास कई बसें होती थीं। लड़कियों की बस कभी देर नहीं होती न कभी नागा होता। इसकी वजह थी हर लड़की कंडक्टर को चार आने देती थी। हम काफी सस्ते में कॉलेज पहुंच जाते। आज इतने सालों बाद भी पटना कॉलेज वैसे ही खड़ा है। बांहें पसारे पुराने यार की तरह, जिसके चेहरे पर झुर्रियां पड़ी हैं। जैसे उम्र गुजरते हुए प्यार के निशान छोड़ देती है। मेरा मन कर रहा है कि मैं अपने गुजरे जमाने को खींचकर अपने पास बुला लूं। पूछूं कि क्या तुम्हें वे दिन याद हैं? तुम ही तो हो हमारे अनुभवों की सारी जमापूंजी के राजदार। कितने अधूरे हैं हम तुम्हारे बगैर। वह हंसा और स्मृतियों के बंद दरवाजे से बाहर निकल आया।
1980-82 का वह दौर
सब्ज जमीन घास से इस तरह ढंक गयी है गोया यह कोई नर्म बिस्तर हो। दिन के उजाले में ओस की बूंदें जुगनू की तरह चमक रही हैं। सामने एक नौजवान आ रहा था। मैंने उसे रोका। राजनीतिशास्त्र की कक्षा? सामने है! इस गलियारे के बाद। एक पगडंडी ऊपर की और जाती है। फिर गलियारा, गलियारे से होते हुए राजनीतिशास्त्र की कक्षा। मुझे याद है – कक्षा में जाने के लिए लड़कियां अकसर शिक्षकों का इंतजार करती थीं। सिर्फ समाजशास्त्र के क्लास को छोड़कर। वहां मामला उलटा था। लड़कियों की तादाद इतनी थी कि लड़के शिक्षक का इंतजार करते थे। राजनीतिशास्त्र में हम तीन लड़कियां थीं। मैं, पूनम और कविता। कविता झारखंड से आयी थी। काफी तेज तर्रार। जीन्स पहनती थी। उन दिनों लड़कियों का पटना में जीन्स पहनना बड़ी बात थी। वह भी को-एड कॉलेज में। क्लास में हमारा पहला दिन था। हम आगे की बेंच पर जाकर बैठ गये। देखा लड़के मुस्कुरा रहे हैं। बोर्ड पर बड़े-बडे हर्फ में लिखा है – कविता मैं तेरे प्यार में कवि हो गया। प्यार का ये इजहार बड़ा फिल्मी था। कविता शर्म से पानी-पानी हो गयी। मैं उठी और बोर्ड पर लिखा यह जुमला मिटा दिया। लड़के ताली बजाने लगे। मैंने मोर्चा संभाला – कहा कि अगर सच में चाहते हो कि लड़कियां भी तुमलोगों से प्यार करें तो पहले दोस्त बनो। यह फिल्मी तरीका लड़कियों को रास नहीं आएगा। मैं पांच मिनट तक बोलती रही। जब बैठी तो पूरा क्लास खामोश था। उन्हें यकीन नहीं आ रहा था कि कोई लड़की इस तरह प्रतिक्रिया दे सकती है। इसका नतीजा अच्छा रहा। उनमें से कई मेरे अच्छे दोस्त बने जो दोस्ती आजतक कायम है।
पटना कॉलेज में दाखिला लेने के पहले मेरा परिचय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े छात्र संगठन एआईएसएफ से हो चुका था। वह 80 का दौर था। सोवियत संघ के विघटन का दौर। पूरी दुनिया में मार्क्‍सवाद को लेकर बहस चल रही थी। ग्लासनोस्त और प्रेस्त्रोइका के फलसफे ने सोवियत संघ की समाजवादी सत्ता को गहरी चुनौती दी थी। रूस को छोड़ कर सभी राज्यों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। सोवियत संघ का विघटन दुनिया के इतिहास के लिए एक नयी परिघटना थी। मार्क्‍सवादियों के लिए नयी चुनौती। जाहिर है, इसका असर हिंदुस्तान की कम्युनिस्ट पार्टियों पर भी पड़ा। फिर भी मार्क्‍सवाद नयी पीढ़ी को आकर्षित कर रहा था। पटना कॉलेज में वाम छात्र संगठनों का दबदबा था। मैं पहली बार वहीं शीरीं से मिली। आमतौर पर ऑनर्स का क्लास आठ बजे से होता था। पर आज क्लास सस्पेंड हो गया। हमलोग गर्ल्‍स कामन रूम में मस्ती कर रहे थे। अचानक एक पतली-दुबली सांवली लड़की मेरे पास आयी। उसने पूछा तुम निवेदिता हो। मैंने सहमति में सर हिलाया। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए कहा मैं शीरीं। कॉलेज में तुम्हारा स्वागत है! अच्छा लगा मुझे। उसने कहा क्लास के बाद हम तुम्हें लेने आएंगे। कुछ नये साथियों से तुम्हारा परिचय होगा। क्लास के बाद शीरीं मुझे कॉलेज के सामने एक किताब की दुकान पर ले गयी। पीपुल्स बुक हाउस। आज वहां वाणी प्रकाशन है। किताबों से भरी उस दुकान के भीतर एक और कमरा था। जहां एक छोटी-सी मेज और कुछ कुर्सियां लगी थीं। वहीं मैं अपूर्व समेत कई साथियों से मिली। लंबा कद, गोरा रंग, बड़ी-बड़ी आंखें। शीरीं ने परिचय कराया ये अपूर्व हैं। उन दिनों पीपुल्स बुक हाउस वामपंथी छात्र संगठनों का अड्डा हुआ करता था। क्लास खत्म होते ही हम वहीं पहुंच जाते थे। अगर कोई उस दौर का इतिहास लिखे तो पीपुल्स बुक हाउस कई आंदोलनों और प्रेम संबंधों के बनने-बिगड़ने के इतिहास का साक्षी होगा।
दुनिया में समाजवाद को लेकर जो बहस हो रही थी उसका असर हमारे छात्र संगठनों पर भी था। हम सब के मन में भी ढेर सारे सवाल उठ रहे थे। सोवियत संघ के बारे में कई बातें छन कर बाहर आ रही थीं। कुछ लोगों को इस बात की खुशी थी कि दुनिया के नक्शे से समाजवाद धराशायी हो जाएगा। खूब गर्मागर्म बहस होती। पार्टी के भीतर ऐसे कम लोग थे जो हमारे मन में उठ रहे सवालों का जबाव दे पाते। हमारी सबसे बड़ी चिंता होती कि कैसे छात्रों को आंदोलन से जोड़ा जाए। ऐसे सवालों का किस तरह सामना किया जाए? एक दिन तय हुआ कि हमलोग वॉलपेपर निकालें। वॉल पेपर के लिए निश्चित जगह तय की गयी। यह समझ बनी कि हम समाजवाद से जुड़े सवालों के साथ-साथ छात्रों की समस्याओं पर भी खबर देंगे। कॉलेज की दीवार का एक कोना चुना गया। जिनके अक्षर सुंदर थे, उन्हें लिखने का जिम्मा दिया गया। यह प्रयोग सफल रहा। अब हर रोज छात्रों की दिलचस्पी रहती कि आज क्या नयी बहस है।
आंदोलन के दौरान मेरी और शीरीं की दोस्ती का रंग गहरा होता गया। उससे खूब बातें होती थीं। हम दिन भर साथ-साथ होते। वहीं पास में इप्टा इंडियन पीपुल्स थिएटर (इप्‍टा) से जुड़े कलाकारों का रिहर्सल होता था। कब हम एआईएसएफ में होते कब इप्टा में, पता ही नहीं चलता। हमारे पांवों में तो घिरनी लगी थी। दोस्तों की कतार लंबी होती जा रही थी। विनोद, श्रीकांत, फौजी, रश्मि, दिलीप और शैलेंद्र। शैलेंद्र झारखंड से थे। हमेशा हमारी चैकड़ी में शामिल रहते। गहरा सांवला रंग और बड़ी बड़ी आंखें। फैज अहमद फैज उसकी जुबान पर रहते। लंबी से लंबी नज्म उसे याद रहती थी। आज भी उसका तेवर बदला नहीं है। अक्सर हम जब पस्त होते, तो उससे कहते कुछ फैज को सुनाओ – वह शुरू हो जाता। उसकी आवाज में आज भी हमलोग फैज को सुनना पसंद करते हैं…
निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के जहां
चली है रस्म के न कोई सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ को निकले
नजर चुरा के चले जिस्म-ओ-जां बचा के चले
गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे हैं ताला-ए रकीब तो क्या
ये चार दिन की खुदाई तो कोई बात नहीं
आज अगर मुझसे कोई पूछे कि मेरी जिंदगी का सबसे सुंदर लम्हा कौन सा था, तो मैं कहूंगी वे दिन जब हम जिंदगी के मायने सीख रहे थे, जब दुनिया को बदलने का सपना देख रहे थे। जब हमें यकीन था कि हम कामयाब होंगे। आज इतने वर्षों बाद जब मैं पीछे मुड़ कर देखती हूं तो लगता है कि कम्युनिस्ट आंदोलन ने और कुछ दिया हो या न दिया हो, पर जीवनदृष्टि तो दी ही। मानवता के पक्ष में खड़े रहने का साहस तो दिया!
मेरे लिए वह पूरा दौर एक फोटो एलबम की तरह है, जहां स्मृतियां बंद हैं। आप जब चाहें, उन स्मृतियों की खुशबू में भींग सकते हैं। स्मृतियों की पलकों पर समय की रंग-बिरंगी बुंदकियां नाचती हैं, फिर वे धीरे-धीरे हवा की तरह गुजर जाती हैं। जो हमेशा आपका साथ देते हैं, वे हैं दोस्त। मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूंजी मेरे दोस्त ही हैं। किसी दोस्त का जीवन से जाना कितना दुख देता है इसे वे ही समझ सकते हैं जिन्होंने दोस्त खोया है। हम सबने चंद्रशेखर को खोया। क्या पता था कि वह हमारी अंतिम मुलाकात थी। हर बार हम मिलते और जुदा होते। जुदाई के दिन बीच में झर जाते थे। आज भी लगता है वह कहीं से आ जाएगा और पूछेगा कि क्या घर में कुछ खाने को है? मैं नाराज होती तो कहता अरे तुम बैठो मैं बना लेता हूं। बनाता कभी नहीं। सभी दोस्त उसे या तो फौजी बुलाते थे या चंदू। अक्सर मैं उसे चिढ़ाया करती थी नागार्जुन की कविता पढ़कर… चंदू मैंने एक सपना देखा… वह मुस्कुराता रहता। उसकी हंसी बहुत खूबसूरत थी। बच्चों सी निश्छल।
Chandrashekharचंद्रशेखर अंतर्मुखी था। अपने बारे में बहुत कम बातें करता था। एनडीए छोड़ने के बाद पटना आ गया था। हमलोग उसके दाखिले की कोशिश कर रहे थे। सेशन शुरू हो गया था इसलिए उसका दाखिला होना मुश्किल लग रहा था। चंद्रशेखर के पिता नहीं थे। मां उसके जीवन का केंद्र थी। अक्सर खतों में वह मां को ढेर सारी बातें लिखता जिसमें उसके निजी जीवन की बातें कम होतीं, देश-दुनिया को बदलने की बातें ज्यादा। उसकी छटपटाहट खतों में दिखती। वह लिखता – इस सड़ी-गली व्यवस्था से मैं कभी समझौता नहीं कर सकता। चंद्रशेखर ने भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी की सदस्यता ले ली और छात्रों के मोर्चे पर जमकर काम करने लगा। सांस्कृतिक गतिविधियों में उसकी गहरी दिलचस्पी थी। उन दिनों सबसे ज्यादा अड्डा विनोद के यहां लगता था। विनोद बीमार थे। बीमार को देखने के बहाने हम वहीं जमे रहते। कविताओं का पाठ होता। कहानियां पढ़ी जातीं। चंद्रशेखर के पसंदीदा शायरों में से थे पाब्लो नेरुदा और पाश। विनोद के घर के अलावा शीरीं और मेरे घर पर लड़कों का खूब अड्डा लगता। मेरा घर अड्डे के लिए सबसे मुफीद जगह था।
मेरे पिता कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े थे। उन्होंने हमें ऐसा वातावरण दिया था कि हम खुल कर बातें करते। बातों में अक्सर मां, पापा भी शामिल रहते। ऐसा माहौल कम ही घरों में मिलता है जहां लड़के और लड़कियां खुलकर बातें कर सकें। हम चार बहनें और दो भाई हैं। मैं सबसे बड़ी। मेरी तीनों बहनें कथक सीखा करती थीं। छोटा भाई आशीष तबला बजाया करता था। हमारी शाम संगीतमय हुआ करती थी। बहनें कथक करतीं। संदीप तबला बजाता। संदीप उन दिनों इप्टा की गायन टीम में हुआ करता था। खूब अच्छा तबला बजाता। तबले पर उसकी उंगलियां थिरकतीं तो झूमने का मन करता। दिलीप इप्टा का मुख्य गायक था। उसकी आवाज में बड़ी मिठास थी। वर्षों से उसकी आवाज नहीं सुनी है। नहीं जानती अब भी उसकी आवाज में वही कशिश है या नहीं। यह वह दौर था जब इप्टा में लड़कियों की अच्छी तादाद थी। रश्मि, शंपा, कविता, सोना, मोना, रूपा, शुभा, माया समेत कई लड़कियों की उपस्थिति ने इप्टा को सांगठनिक मजबूती दी थी। रश्मि अच्छी अभिनेत्री थी। अलका की आवाज में खूब खनक थी। अगर उसने संगीत को समय दिया होता तो शायद उसकी गायकी पर दुनिया को नाज होता। इप्टा से जुड़ने के बाद मैंने अपनी तीनों बहनों को जोड़ा। शंपा और कविता समेत कई लड़कियों को हम संगठन से इसलिए जोड़ पाये कि इप्टा और एआईएसएफ ने विश्वविद्यालय में अपनी गहरी पहचान बनायी थी। आज रंगमंच में अच्छी अभिनेत्रियों की कमी खटकती है। इसकी बड़ी वजह है कि महिलाओं को जोड़ने की कभी सार्थक पहल नहीं की गयी, न ही वैसे नाटक किये जा रहे हैं, जिनमें अभिनेत्रियों को जगह मिले।
चंद्रशेखर उन दिनों अक्सर हमारे घर आया करता था। जब सब दोस्त साथ होते तो कई मसलों पर जमकर बहस होती। धर्म, जाति, प्रेम जैसे तमाम मुद़्दे हमारी बहस के केंद्र में होते। हमलोग उन दिनों गर्दनीबाग में रहते थे। घर से लगा बड़ा सा टेरेस था। अक्सर गर्मियों में हम सब की शाम छत पर गुजरती। सामने खुला मैदान था। शाम हो गयी थी और मेरे सारे दोस्त जमे हुए थे। उन दिनों घर पर नानाजी आये हुए थे। हमलोग गप्प में मशगूल थे। मौसम खुशनुमा था। दरख्तों पर परिंदें रात का बसेरा लेने के पहले जोर-जोर से चहचहा रहे थे। हवा पेड़ों के झुरमुट में सांय-सांय कर रही थी। हमलोग मौसम का मजा ले रहे थे कि नानाजी ने पूछा कि तुम्हारे दोस्त कभी घर नहीं जाते? फिर उन्होंने सबसे कहा कि तुमलोग विद्यार्थी हो, पढ़ने के समय में पढ़ा करो। उस दिन उन्होंने सबका जमकर क्लास लिया। हम रुंआसे हो रहे थे। पता नहीं उन लागों को कितना बुरा लगा होगा। हमें लगा नानाजी के रहते ये लोग नहीं आएंगे। पर मजा तब आया जब सब दोस्त फिर आये और नानाजी से दोस्ती कर ली। चंद्रशेखर की नानाजी से सबसे ज्यादा पटती थी। वह उनकी बातें खूब गौर से सुना करता था। एक दिन उन्होंने उससे पूछा तुम कम्युनिस्ट हो? तुमलोग तो धर्म मानते नहीं! कभी रामायण पढ़ी है? उसने कहा पढ़ी है नानाजी। नाना ने पूछा – रामायण अच्छी लगती है? जी! कौन सा प्रंसग सबसे ज्यादा अच्छा लगता है? सीता-हरण! नानाजी चैंक गये। क्यों? वह हंसा! तुलसी रामायण में उसका बहुत सुंदर वर्णन है। सुनाऊं?
राम ने जंगल से गुजरते हुए लक्ष्‍मण से कहा – जंगल कितना खूबसूरत है। कौन इसकी खूबसूरती पर फिदा नहीं होगा! जब हिरण हमारी आहट पर भाग खड़े होते हैं तो उनकी हिरनियां उनसे कहती हैं, डरो नहीं… तुम तो जन्म-जन्म के हिरण हो, लेकिन ये दोनों तो एक सुनहरे हिरण की तलाश में आये हैं… भैया देखो, बसंत रुत कितनी खूबसूरत है! कामदेव सीता के खो जाने की वजह से मुझे उदास देखकर जंगल और शहद की मक्खियों और चिड़ियों की अयानत से मेरे ऊपर हमला करने आ रहे हैं। दरख्तों पर फैली हुई बेलें उसकी फौज के खेमे में हैं। केले और ताड़ के पत्ते उसके अलम, फलों की झाड़ियां उसके तीर-अंदाज और कोयल की आवाज गोया उसके जंगली हाथी की चिंघाड़ हैं। बगुले और मैनाएं कामदेव के ऊंट हैं। मोर और राजहंस उसके अरबी घोडे, पामोज परिंदे और जंगली तीतर उसके प्यादे हैं… चट्टानें कामदेव के रथ हैं आबाशार उसके नक्कारे, मुअत्तर हवाएं उसके जासूस… ए लक्ष्मण! जो कामदेव की फौज का मुकाबला कर सके, वह सचमुच बड़ा जरी है। कामदेवता का सबसे बड़ा हथियार औरत है।
नानाजी की आंखों से आंसू टपक रहे थे। वे उसकी आवाज के जादू में खोये रहे। जब संभले तो पूछा यह किसकी रामायण की कथा है। वह हंसने लगा। मैं खींच कर उसे ले आयी। क्या सुना रहे थे? उसने कहा तुम्हारे नानाजी को आज शीशे में उतार लिया। शुक्रिया अदा करो कुर्रतुल ऐन हैदर का। उनकी कहानी का अंश है। यार तुम्हारी याददाश्त जबरदस्त है। मान गये। आज चंद्रशेखर की बेतहाशा याद आ रही है। वह ऐसा ही था। अपने भीतर जाने कितनी दुनिया समेटे हुए।
Chandrashekhars Motherहमारी अंतिम मुलाकात अपूर्व के घर हुई थी। जब सीपीआई एमएल ने उसे सीवान में जाकर काम करने का जिम्मा दिया था। मां भी आयी हुई थी। इस बात से परेशान थी कि वह वहां काम नहीं करे। मां ने हमलोगों से कहा कि उसे समझाओ। सीवान में शहाबुद्दीन का आतंक था। आज भी उसका आतंक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हमलोगों ने कहा, तुम्हें अभी दिल्ली में ही काम करना चाहिए। तुम्हारी वहां जरूरत है। वह हमारी बातों से दुखी हो गया। उसने पूछा, क्या तुमलोग समझते हो शहाबुद्दीन के डर से हम काम करना छोड़ दें? क्या डर कर राजनीति की जा सकती है? हमलोगों ने समझाया कि डरने की बात कौन कर रहा है, पर लड़ाई लड़ने के पहले अपनी तैयारी करनी चाहिए। वह माना नहीं। उसके कुछ ही दिनों बाद उसकी हत्या की खबर आयी। फोन पर शकील की भर्रायी हुई आवाज आयी। बुरी खबर है निवेदिता। चंद्रशेखर नहीं रहा। मुझे समझ नहीं आया, क्या बोल रहे हैं शकील। क्या कह रहे हो! यह सच है! वे रो रहे थे, रात के सन्नाटे में मैं पत्थर-सी बैठी रही।
कुछ दुख होते हैं, जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है। देर रात तक हमलोग पूरब के घर बैठे रहे। सुबह सीवान के लिए निकल पड़े। समझ में नहीं आ रहा था कि हम मां का सामना किस तरह करेंगे। माले पार्टी ऑफिस में नीचे जमीन पर वह पड़ा हुआ था। जैसे गहरी नींद में हो। चेहरे पर चिरपरिचत मुस्कान लिए। कैसी विचित्र बात है, सुखी दिनों में हमें अनिष्ट की छाया नहीं दिखाई देती। जैसे हमें विश्वास हो कि हम जिंदगी भर साथ रहेंगे। उसके जाने के बाद पहली बार हम रोये थे। बेबस, पागलों की तरह। उसकी शव यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। जो शामिल नहीं थे वे अपने घरों से, छत की मुंडेरों पर खिड़कियों से देख रहे थे। उस यात्रा में विनोद मिश्र साथ चल रहे थे। दुख से भीगे हुए। मैं उबल पड़ी थी उन पर। चंद्रशेखर की मौत के लिए आपलोग भी जिम्मेदार हैं। बिना किसी तैयारी के आपने उसे यहां क्यों बुलाया। उस हत्यारे से लड़ने के लिए निहत्था छोड़ दिया। विनोद मिश्र कुछ नहीं बोले, रूमाल से अपने चश्मे के शीशा को पोंछा और बादलों में डूबते सूरज की पीली आभा को देखते रहे… जिसकी महीन क्लांत छाया चंद्रशेखर की देह पर पड़ रही थी।
हमलोग कुछ देर वैसे ही अवसन्न राख के ढेर के सामने बैठे रहे। धूप पुरानी बुझी हुई चिताओं की काली कतार पर चली आयी थी। वह सूनी आंखों से उठती हुई लपटों को देख रहे थे। धुंध और धुएं में चमकती हुई आकृति। ये मां थी। उसके आंसू सूख गये थे। जैसे सागर ने अपना सारा जल त्याग दिया हो। मां ने कहा, तुम्हें बोलना होगा मेरी बच्ची। मेरे कानों में मां के शब्द गूंज रहे हैं। बोलो मेरी बच्ची बोलो! अपने दोस्त के लिए! न्याय के लिए! उन आने वाले तमाम दिनों के लिए – आंसुओं से भरे गले से मैंने ऊंचे स्वर में कहा – वे हत्यारे फिर शिकार पर निकले हैं, आज हमारी सड़कों पर तबाही मचा रहे हैं। वह देखो जो शैतान की तरह चमक रहा है, प्रहार करने के लिए उठा है – आओ हमारा भी कत्ल करो। आओ हम देखें तुम्हारी ताकत!
पूर्वा मेरा हाथ खींच रही है। चुप हो जाइए आप। वह रो रही है, मुझे होश नहीं। शहाबुद्दीन! आओ, देखें तुम्हारी ताकत! एक चंद्रशेखर को मारा हजार चंद्रशेखर पैदा होंगे।
पूर्वा ने मुझे खींच कर पकड़ लिया। हम दोनों फफक कर रो पड़े। बादलों के टुकड़े में सूरज छुप गया था, एक सावंली सी मंद रोशनी शहर की छतों पसर गयी। मन में आग लिये हम सब लौट आये।
दुख बीत जाता है। अगर बीते नहीं तो जीना मुश्किल होगा। सुख कभी पूरा नहीं होता है। चंद्रशेखर ने जब सीपीआई छोड़ी, तो काफी परेशान रहता था। मौजूदा पार्टी नेतृत्व को इस बात की चिंता नहीं थी कि उनका एक साथी गहरी पीड़ा में है। उसके मन में पार्टी से जुड़े कई सवाल थे, जिस पर कम से कम बात तो होनी ही चाहिए थी। सोवियत संघ में भले ही ग्लासनोस्त और प्रेस्त्रोइका की जमीन फैल रही थी पर सीपीआई अपने भीतर किसी तरह के बदलाव से डर रही थी। पार्टी के भीतर यह समझ थी कि अगर यहां भी विचारों के स्तर पर इतनी छूट दी गयी, तो पार्टी का सांगठनिक ढांचा चरमरा जाएगा। पर नयी हवा को जब सोवियत संघ नहीं रोक पाया, तो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कैसे रोक पाती। वे समझ नहीं पाये कि नौजवानों पर स्तालिनी डिसिप्लिन नहीं चलेगा। जो लोग पार्टी लाइन से अलग होते, वे या तो अवसरवादी होते या समझौतापरस्त। इसी उधेड़बुन में चंद्रशेखर दिल्ली चला आया और आइसा से जुड़ गया। वैचारिक स्तर पर तीनों कम्युनिस्ट पार्टियों में बहुत बुनियादी फर्क नहीं है, पर इनके बीच कभी व्यापक एकता नहीं बन पाती। कई बार ये बुर्जुआ पार्टी से समझौता कर लेते पर एक-दूसरे से समझौता करने में सैद्धांतिक मतभेद आड़े आ जाता। चंद्रशेखर को माले के साथ जुड़ने पर दिल्ली में नयी जमीन मिली। छात्रों के बीच उसने जमकर काम किया। पर वह हमेशा मानता था कि बतौर कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई में विचारों की आजादी ज्यादा है। फिर भी उसके दिल में कहीं फांस थी कि वह हमलोगों से मिलने में कतराने लगा। मैं अखबार में काम करती थी, इसलिए वह जब भी बिहार आता मुझे उसकी भनक मिल जाती।
पटना में विनोद मिश्र आये हुए थे। उनका प्रेस कांफ्रेंस था। मुझे पता था कि चंद्रशेखर पार्टी ऑफिस में है। प्रेस कांफ्रेस के बाद मैं उससे मिलने गयी। मैंने कहा, तुम यहां क्या कर रहे हो? घर चलो। उसके बिना बोले मैंने उसका सामान उठाया और हम रिक्शे से घर आ गये। मैंने कहा पार्टी तुमने बदल ली, इसका मतलब यह तो नहीं कि दोस्त भी बदल जाएंगे। और तुम कितनी दूर ही गये हो। लेनिन से स्टालिन तक। हम दोनों खिलखिला कर हंस पड़े। उसकी आंखें डबडबा गयीं। विचलित सी कर देनेवाली आवाज में उसने कहा, तुम्हारी यही खासियत है तुम किसी को खुद से दूर जाने का मौका नहीं देती।
आज सोचती हूं कि उसे दूर जाने से कहां रोक पायी?
(निवेदिता के स्‍मृति-कोलाज का यह पहला हिस्‍सा है। वह इसे आगे बढ़ाएंगी…)
(निवेदिता झा। वरिष्‍ठ पत्रकार। सामाजिक कार्यकर्ता। बरसों राष्‍ट्रीय सहारा और नई दुनिया से जुड़ी रहीं। महिला मुद्दों पर बेहतरीन पत्रकारिता के लिए उन्‍हें 2010-2011 का लाडली मीडिया अवार्ड मिला। उन्‍हें कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। पटना में रह रहीं निवेदिता से niveditashakeel@gmail.com पर संपर्क करें।)

7 Responses to कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है

  1. सुशांत झा says:
    बढिया संस्मरण…और उस दौर का एक अच्छा डोक्यूमेंटेशन। पता चलता है कि चंद्रशेखर कितने लोकप्रिय थे। निवेदिताजी को धन्यवाद।
  2. harish pathak says:
    yado ki itni shandar prastuti lajawab he.niveditaji ki bhasha to aakarshak he hi.meine unke sath kaam kiya he.harish pathak
  3. avadhesh kumar singh says:
    sukriya karam nawajish very good your are jiniyas. i like your atical
  4. Runu says:
    smriti kE patal per phir Se wo daur palat ker aya jub yakeen tha kee hum badal dalengE is duniya kE halat..per kuchh taqateN jo humsE taqatwer thee..wo jeeteeN..per hum harE nahee hai…abhee bhee chingari jal rahee hai..ummeed hai ki phir sE wo alam lautega…shayaad is karvaaN mE hum na hongE…shaheed sabhee sathiyoN ko salaam…
  5. बेहतरीन संस्मरण!
  6. mukesh kumar says:
    Adbhut…Nivedita ji ne sangharsh ke us daur ko punarjivit kar diya hai apne is sansmaran me. keval ghatnao ka byora nahi hai, usme apanepan ka sparsha hai, jaise kisi naye patte ko chhone ka man karta hai vaisa. Us umra ke sambandha kitne nissvarth ahote hai, unme kitni gahrai hoti hai ise unhone jis tarah bayan kiya hai, usase bahut kuchh sikha ja sakta hai. sachmuch padhkar bahut sukoon mila. bahut bahut badhaiya…sisila jari rakhe.
  7. भुवन कुमार says:
    चंदू से जुड़ी अन्य पहलुओं को साझा करने लिए आपका शुक्रिया। बेहतरीन आलेख।

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yado ne palko se nind chura li

निवेदिता
पिछली रात देर तक नींद नहीं आयी। यादों ने मेरी पलको से नींद चुरा ली। कमरे में एक म्लान सा अंधेरा है। अंधेरे को टटोलते हुए यादें मेरे सिराहने खड़ी हैं। वह हंस रही है, चिढ़ा रही है। कामरेड भागो नहीं दुनिया को बदलो। मैं बुदबुदा रही हूं… भागे नहीं थे हम। तो फिर क्या हुआ उन सपनों का, जिसके लिए तुमलोग मारे-मारे फिरते थे? उन दिनों यही लगता था कि हम दुनिया को बदल डालेंगे। उन सपनों पर यकीन भी था। अगर यकीन नहीं होता तो क्या हम दुस्साहस कर पाते। यादें तारीक के जंगलों से निकल कर मेरे करीब खड़ी हो गयीं।
मुझे ठीक-ठीक याद नहीं, वह साल कौन सा था। शायद ’83 के आस-पास की घटना होगी। देश की सत्ता इंदिरा गांधी के हाथों में थी। सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद इंदिरा गांधी को मैं निजी तौर पर पसंद करती हूं। दुनिया के इतिहास में ऐसी महिला प्रधानमंत्री कम रही हैं, जिन्होंने एक राजनीतिक हस्ती के रूप में अपनी गहरी छाप छोड़ी हो। इंदिरा गांधी ने हिंदुस्तान पर 16 सालों तक राज किया। 1975 में आपातकाल लागू करने के फैसले ने उनको सत्ता से बाहर कर दिया। 1977 के चुनाव में उन्हें गहरी हार का सामना करना पड़ा, 1980 में भारी बहुमत के साथ उनकी वापसी हुई।
वो गर्मी की एक सुबह थी, जब इंदिरा गांधी ने गांधी मैदान से अपनी विशाल सभा को संबोधित किया था। पटना की धरती का एक विशाल कोना, जिसके सीने में जाने कितने इतिहास दफन हैं। हम सुबह ही पहुंच गये थे। रात के ओस से अभी तक जमीन गीली थी और आसमान साफ। नर्म और करीने से कटे दूब के बीच लाल और पीले अमलतास के गाछ। प्रकृर्ति अपने तमाम कयानात को समेटे बैठी थी। मैं सोच रही थी कि इतिहास सिर्फ राजा महराजाओं का इतिहास नहीं होता, इतिहास उनका भी होता है जो दुनिया को बदलने में यकीन रखते हैं। हमारे टीचर कहते थे इतिहास तब तक समझ में नहीं आएगा, जब तक फलसफा न पढ़ो… हम फलसफा समझने की कोशिश कर रहे थे कि शीरीं ने आवाज दी। कहा – अभी चलो मीटिंग है। अभी? अचानक! क्या हुआ? कल इंदिरा गांधी आ रहीं हैं।
साथियों ने तय किया है कि उन्हें काला झंडा दिखाया जाए। मैं सकते में आ गयी। क्या कह रही हो? दिमाग खराब हुआ है? यह कोई बच्चों का खेल है? यह कब फैसला हुआ? उसने कहा – अभी फैसला नहीं हुआ है। उसी के लिए मीटिंग बुलायी गयी है। चलो…
उन दिनों एआईएसएफ का दफ्तर लंगर टोली में था। दो मंजिले मकान के ऊपर। कमरे में एक टेबुल और सात-आठ कुर्सियां लगी हैं। सामने खुरदरी दीवार पर भगत सिंह का पोस्टर लगा हुआ है। पोस्टर काफी पुराना है। कमरा किसी ठहरे हुए जहाज की तरह है। हम सब बैठ गये। कुछ ही देर बाद हमारे सचिव आ गये। लाल सलाम कॉमरेड। लाल सलाम। सबने एक दूसरे का हाथ उठा कर अभिवादन किया। आप सबों को एक महत्वपूर्ण विषय पर बात करने के लिए बुलाया गया है। यह कहकर उन्होंने हम सब की ओर देखा। जब उन्हें इत्‍मीनान हो गया कि उनकी बातों को सब गंभीरता से सुन रहे हैं, तो उन्‍होंने अपनी बात शुरू की। कहा – इंदिरा गांधी पटना आ रही हैं। मेरी राय है कि हमें उनका विरोध करना चाहिए। पिछले दिनों देश के जो राजनीतिक हालात रहे हैं, आप सब जानते हैं। आप ये भी जानते हैं कि हमारी शिक्षा की क्या स्थिति है। नयी शिक्षा नीति को हमलोगों पर थोपने की कोशिशें हो रही हैं। इतनी बेरोजगारी बढ़ रही है। ये ऐसी शिक्षा नीति है, जो असमानता और गैर बराबरी को बढ़ावा देगा। अगर इसका जोरदार विरोध नहीं हुआ, तो आने वाले दिन इससे भी बुरे होंगे। मेरा प्रस्ताव है कि हम इंदिरा गांधी का पुरजोर विरोध करें।
इस प्रस्ताव पर लगभग चार घंटे तक बहस हुई। सवाल खड़े किये गये कि इंदिरा गांधी के विरोध का आधार क्या है? कॉमरेड ने बहुत साफ-साफ और सधी हुई आवाज में कहा – साथी आज हम नये संकटों से जूझ रहे हैं। हम सब एक बेहतर दुनिया के लिए लड़ रहे हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि देश की सत्ता आम आदमी के प्रति कितनी जबावदेह है? ऐसे वक्त में मुझे चार्ली चैप्लिन की फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर की हमेशा याद आती है। जिस फिल्म के अंतिम संवाद में उन्होंने कहा था – हम एक ऐसी दुनिया के लिए लड़े, जहां विज्ञान और उन्नति हम सब के लिए खुशियां लेकर आये। पर ये उन्नति हमारे लिए नहीं है। वे धोखेबाज हैं। झूठे हैं। अपना वादा पूरा नहीं करते। मैं पूछता हूं एक राजनीतिक पार्टी के तौर पर कांग्रेस ने देश की जनता को क्या दिया? महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, गलत नीतियां, भाई भतीजावाद! क्या पूंजीवाद व सामंतवाद के संरक्षण का काम कांग्रेस नहीं कर रही है?
यह जबरदस्त भाषण था, जिसका असर हुआ। कामरेड की बातों से सब सहमत दिखे। आखिर तय हुआ कि गांधी मैंदान में आयोजित उनकी आमसभा का बहिष्कार किया जाए। गुप्त योजनाएं बनीं। मुझे सुबह छह बजे एआईएसएफ के दफ्तर पहुंचने कहा गया। साथ ही ताकीद की गयी कि किसी को कानों खबर नहीं हो।
छह बजे कॉलेज की बस आती थी। हम मुंह अंधेरे बस स्टॉप पर पहुंच गये। अभी वहां खड़े ही हुए थे कि देखा मां घबरायी सी भागती आ रही है। घबराहट में वह नंगे पांव दौड़ती चली आयी। दरअसल हमारी योजनाओं का पता मेरे छोटे भाई प्रियरंजन को लग गया था। उन दिनों वह नया-नया छात्र संगठन से जुड़ा था। उसने मां को खबर कर दी कि हमलोग आज इंदिरा गांधी का विरोध करेंगे। मैंने किसी तरह मां को विश्‍वास में लिया। उसे यकीन दिलाया कि हम ये सब नहीं करेंगे। मैं समय से आधे धंटे देर से पहुंची। सभी साथी मेरी राह देख रहे थे। इंदिरा गांधी की सभा पटना के गांधी मैदान में थी। गांधी मैदान में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम थे। यह तय हुआ कि पहले मैदान का जायजा ले लिया जाए। मुझे, शीरीं और नूतन को मंच के पास अगली कतार में जाकर बैठने का जिम्मा मिला था। योजना बनी कि जैसे ही इंदिरा गांधी संबोधित करेंगी हम लड़कियां काला झंडा उन्हें दिखाएंगे। लड़कों को कहा गया कि वे गैस वाले बैलून में काला रिबन लगाएंगे। हमारे झंडा लहराने पर लड़के सारे बैलून को आकाश में छोड़ देंगे। हमारा कोड वर्ड था, भाइयो और बहनों।
मेरे पास उन दिनों एक लाल रंग का बैग था। हमें खूब सारा पर्चा दिया गया। मेरे जिम्मे था इंदिरा गांधी को भरी सभा में काला झंडा दिखलाना। शीरीं के जिम्मे पर्चा बांटना। नूतन को यह कहा गया कि अगर हम दोनों गिरफ्तार हो गये, तो साथियों को इसकी सूचना देना। हम तीनों में नूतन सबसे छोटी थी। मैंने नूतन को देखा। उसके चेहरे पर हल्की घबराहट थी। लंबा फ्रॉक, सर से लटकती दो लंबी चोटी। जिसे वह बार बार सहला रही थी। उसकी कैफियत बयान नहीं की जा सकती। शीरीं बड़ी दिलेर लड़की थी। मैंने उसे कभी घबराते हुए नहीं देखा। हम तीनों अगली कतार में जाकर बैठ गये। यह जगह वीआईपी के लिए थी। हमलोगों को पुलिस ने यह सोच कर नहीं रोका कि शायद हम कांग्रेस नेता के परिवार से हैं। पहली बार मैं इतने नजदीक से इंदिरा गांधी को देख रही थी। एक ऐसा सौंदर्य, जिसमें भव्यता भी है और सादगी भी। सामने मंच पर बहुत बड़ी मेज थी, जिसके इर्द-गिर्द मखमल की, ऊंची पीठ वाली कुर्सियां लगी थीं। एक गहरे लाल मखमल का शाही किस्म का दीवान और एक तरफ काली चमकती हुई लकड़ी की मेज पर कई माइक लगे थे। मैं देखती रह गयी। वो सधे कदमों से माइक तक पहुंची। हाथ हिलाकर अभिवादन किया। इंदिरा गांधी जिंदाबाद के नारों से गांधी मैदान गूंज उठा। पूरी भव्यता समेटे हुए उन्‍होंने सर पर आंचल को संभाला। मैंने अपने अंदर की औरत को जी भर के देखा। ये जो सामने खड़ी है, वह भी तो हम सब जैसी है। उसका रूप इतना भरा-पूरा था कि मैं भूल गयी की यहां क्यों आयी हूं। जब ख्याल आया तो मेरे पांव जम गये। दिल की धड़कन तेज हो गयी। जैसे ही उन्होंने ने कहा भाइयों और बहनों कि मैंने बैग से काला झंडा निकाला और लहरा दिया। इसके पहले की लोग समझ पाते, शीरीं ने पर्चा बांटना शुरू कर दिया। सभा में अफरा-थफरी मच गयी। मैं अपनी पूरी ताकत से चीखी – इंदिरा गांधी वापस जाओ! इंदिरा गांधी मुर्दाबाद! मुझे होश तब आया, जब चारों ओर से महिला पुलिस ने मुझे दबोज लिया। मेरी चोटी पकड़ कर वे खींचते हुए बाहर ले आयीं। दर्द से मेरा चेहरा लाल हो गया। कमर तक फैले हुए मेरे काले-घने बाल मेरी मुसिबत बन गये। मैंने कहा मेरे बाल छोड़ि‍ए। एक हट्टी-कट्टी महिला पुलिस ने मेरे कमर पर जोर से एक डंडा जमाया और कहा साली की हिम्मत देखो। और उसे जितनी मादा गालियां आती थीं, उसने चुन-चुन कर दिया। मैं सोच रही थी सत्ता सत्ता होती है। औरत और मर्द नहीं।
हमें गिरफ्तार कर लिया गया। मुझे सबसे ज्यादा चिंता मां की थी। कल होकर जब अखबारों में खबर आएगी तो वह क्या करेगी। थाने से मेरे पिता के पास फोन गया। पापा के शब्‍द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं। उन्होंने कहा कि आपका कानून जो कहता है कीजिए। मेरी बेटी जानती है कि उसे क्या करना है। उन्होंने पुलिस से कोई पैरवी नहीं की। मुझे छुड़ाने अपूर्व आये थे। पुलिस वाला बांछे खिलाये बैठा था। उसने मेरा लाल रंग का बैग कब्जे में कर लिया था। जिसमें मेरे कुछ नोट्स बुक पड़े हुए थे। उसने कापियां उलट-पुलट कर देखा जैसे सुराग तलाश रहा हो। मेरी दोनों कापियां ले ली और पूछा ये क्या है? अपूर्व ने कहा ये नोट्स बुक हैं। निसार मैं तेरी गलियों के ऐ वतन के जहां चली है रस्म के कोई सर उठा के न चले… फैज की नज्म झिलमिला रहे थे मेरे पन्नों पर। उसने ताकीद के साथ मेरा बैग लौटा दिया।
हम सब के जीवन में ऐसी कई घटनाएं घटीं, जिसने हमारे अनुभवों का विस्तार किया। यादें चाहे जितनी यातनापूर्ण हो, है तो वह हमारे जीवन का हिस्सा। हम बार बार लौटते हैं उन्हीं स्थानों पर, जिसे किसी अनजाने क्षण में हमने छोड़ दिया था। यूनिवर्सिटी खुली और पढ़ाई तेजी से शुरू हो गयी। क्लास में लेक्चर होते थे। लेक्चर के बाद हम और शीरीं ट्यूटोरियल क्लास में साथ होते। मगध महिला से लेकर साइंस कॉलेज तक छात्रों के बीच काम करने का जिम्मा हमलोगों का था। हम सब का ज्यादा समय सड़क पर ही बीतता। कॉलेज में सामने गंगा बहती। चैत के माह में बड़ा भारी मेला लगता। मेले की बड़ी वजह थी काली मंदिर। यह मंदिर कई वजहों से लोकप्रिय था। जब सब मंदिर में कामना करते होते, मैं और शीरीं गंगा के किनारे बैठे रहते। शीरीं पूछती, तुमने बनारस की सुबह और अवध की शाम देखी है? हमारी गंगा में तो दोनों दृश्‍य देख सकते हैं।
शीरीं में साहित्य की गहरी समझ थी। यह उसे विरासत में मिला था। उसके पिता, जिन्हें हम आलम चाचा कहते थे, साहित्य उनके जीवन में रचा-बसा था। उनके घर पर अकसर महफिल जमती। उनको देखकर लगता कि मैं जीवित इतिहास के साथ हूं। जिनकी पूरी जिंदगी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए थी। जो अब तक कई बार जेल जा चुके थे। कई बार बिना खाये-पीये लगातार काम करते रहते। अक्सर बहस में वे बताते वर्ग संघर्ष क्या है? पूंजीवाद क्या है? वे इस बात पर यकीन करते कि सर्वहारा की जीत निश्चित होगी। उन दिनों जब लड़कियों का घर से निकलना ही बड़ी बात थी। शीरीं को पूरी आजादी थी। उतनी ही आजादी जितना मनुष्य होने के नाते एक मनुष्य को मिलना चाहिए। शीरीं बुरका नहीं पहनती थी न ही अल्ला पर उसका एतबार था। वाम आंदोलन के प्रति उसकी गहरी आस्था थी।
उन दिनों कम्युनिस्ट पार्टी के होलटाइमर को इतने कम पैसे मिलते थे कि उससे परिवार चलाना और बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाना मुश्किल था। पार्टी होलटाइमर के बच्चे रूस जाकर पढ़ सकते थे। यह सुविधा वैसे कॉमरेड के परिवार के लिए था, जो होलटाइमर थे। मुझे याद है, मास्को जाने के फैसले के बाद शीरीं बहुत उखड़ी-उखड़ी रहने लगी थी। जाने के एक दिन पहले हम मिले थे। वह पूरे समय रोती रही थी। उसके भीतर भयानक तूफान मचा था। वह जानती थी कि एक दूसरे देश में उसके आंसू देखकर संजीदा और पशेमान होने वाला कोई नहीं होगा। पर वही देश था, जो बाद में शीरीं के दिल में बस गया। मास्को जाने के बाद भी उसकी लंबी-लंबी चिट्ठियां आती। जिसमें देश के राजनीतिक हालात और वाम संगठनों को लेकर गहरी चिंता रहती। मास्को में रहते हुए उसके कुछ अच्छे दोस्त बने, जिसमें सुनंदा उसके दिल के सबसे करीब थी। उसकी हर चिट्ठियों में उसका जिक्र होता। प्यार से लबरेज उसके खत आते…
मेरी प्यारी निवेदिता,
तुम्हें इस बात का अंदाज नहीं होगा कि मैं तुम्हारे खतों का कितनी बेताबी से इंतजार करती हूं। मास्को एक खूबसूरत शहर है। वोल्गा नदी के किनारे। यहां के लोगों का अकीदा है कि अगर वोल्गा नदी में अपनी दोस्ती के नाम पर ताला लगाकर चाभी को फेंक दो, तो पूरी जिंदगी एक दूसरे के साथ गुजरेगी। जाने कितने जोड़ों के रिश्‍ते की चाभी वोल्गा नदी के पास है। कई बार मन में आया मैं भी तुम्हारे नाम की चाभी नदी में प्रवाहित कर दूं, पर लगा यार तुमसे अलग जाएंगे कहां। हमारी दोस्ती का तो खूंटा बंध गया है। तुम्हें पता है मेरे कॉलेज से एक सीधी सड़क जाती है रेडस्कायर तक। जहां लेनिन चिर निद्रा में सोये हुए हैं। मैं उन्हें देखने गयी थी। देखकर मेरे बदन में झुरझुरी सी आने लगी। तुम सोच कर देखो, जिन्हें हम किस्से कहानियों में सुनते थे, उस आदमी को साबूत देखना। वह इतिहास का ऐसा अंश है, जिसे देखकर क्रांति में यकीन होने लगता है। जैसे हर क्रांति में अगली क्रांति का बीज छिपा हो। तुम्हें पता है सर्दियों में यह शहर बर्फीले पेड़ से भर जाता है। सामने वोल्गा बहती रहती है। अक्सर मैं वोल्गा की तारीक लहरों को देखती रहती हूं। रात गहरी हो गयी है। वोल्गा धीमे-धीमे बह रही है। तुम होती तो इस देश की खूबसूरती में खो जाती। मुझे वो गीत याद आ रहा है, जो अक्सर तुम सुनाया करती थी। ‘रात अंधेरी है और बादल गहरे’… तुम ऐसी रात में किस तरह आओगे। बस आज यहीं तक। अब नींद आ रही है।
तुम्हारी शीरीं
मेरे पास अब शीरीं के खत ही रह गये हैं। वर्षों से हम नहीं मिले हैं। या यूं कहूं की उसने अपने अतीत का सारा हिस्सा खुद से अलग कर दिया। पर हम अलग हुए कहां? जिंदगी आगे बढ़ती हुई खाली जगह छोड़ती जाती है, जिसमें गुजरी हुई घटनाएं अपना घर बनाती जाती है। समय के चेहरे पर स्मृति की पुरानी छाया उतर आयी। मेरे गले की आवाज गीली है। होठों पर जो लब्ज हैं, सूखे नहीं। कितना कुछ है यादों में जो मेह की तरह बरस रहा है।
ऐसी ही अवसन्न सूनी दोपहर थी, जब हम सुनंदा से पहली बार मिले। सुनहले पीले रंगों के कपड़े में एक लड़की सालों बाद इस तरह मिलेगी, यह कभी सोचा नहीं था। कभी-कभी अतीत अचानक से आपके सामने खड़ा होता और आप हैरान हो जाते हैं। जैसे कोई पुराना सपना धीरे धीरे कदमों से आपके पास आ गया हो। देखते ही वह पहचान गयी। उसने पूछा तुम पटना वाली निवेदिता हो? मैंने सर हिलाया। वह मेरे गले से लिपट गयी। मैं सुनंदा। शीरीं वाली सुनंदा? वह चिल्लायी – हां। हम घंटों शीरीं के बारे में बातें करते रहे। जंग लगी पुरानी यादों को खुरच-खुरच कर ताजा करते रहे।
उसने पूछा, शीरीं की कोई खबर? नहीं यार। अंतिम बार चाचा के रहते मिले थे। फिर उसका परिवार दिल्ली चला गया। उड़ते उड़ते खबर आयी की उसने शादी कर ली है। हममें से उसने किसी को खबर नहीं किया। मुझे भी नहीं। अच्छा वह बच कर जाएगी कहां? हम उसे तलाश लेंगे। हमारी बातें खत्म नहीं हो रही थीं। जिंदगी के बीते पन्ने पलटते जा रहे थे। स्‍मृति पुराने नोटबुक की तरह है, जिसके सफे पर आंखें अटक जाती है।
सालों बाद जब अपने बीते दिनों को सहेजने बैठी हूं, तो लगता है बहुत कुछ है, जिसे साझा किया जाना चाहिए। वाम आंदोलन ने सिर्फ विचार ही नहीं दिये, बहुत सारे दोस्त भी दिये। वही पूंजी हमारे पास बची हुई है। हम बहस करते, लड़ते-झगड़ते, पर विचारों के लिए हमेशा जगह बनी रहती। दोस्तों की मंडली में शैलेंद्र के पास जंगल के गहरे अनुभव थे। वह आदिवासियों के बीच काम करता था। झारखंड उन दिनों बिहार का ही हिस्सा था। अर्पूव अक्सर राजनीति पर बातें करते। श्रीकांत और विनोद नाटक और इप्टा की बातों में रमे रहते। दिलीप गाने की धुन बनाने में लगा रहता। चंद्रशेखर को राजनीति में जितनी दिलचस्पी थी, उतनी ही रंगकर्म में। उसे लड़कियों की बात करने में भी मजा आता था। शीरीं हमेशा गंभीर बनी रहती। रश्मि के पास इप्टा के अलावा भी ढेर सारे मजेदार किस्से होते। वह उन दिनों पटना इनजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ती थी। हम चटखारे ले-ले कर कॉलेज की प्रेम कथाओं को सुनते और अपने प्रेम की गाथाओं को भी महिमामंडित करते। नासिर जो हम सबों में छोटा था, हमारी बातें रस ले-ले कर सुना करता। अफशां, पूर्वा और नासिर जिसे हम कब्बू कहते हैं, उनकी आपस में खूब छनती थी। नासिर उन लोगों में से है, जिसने अपनी मेहनत से जीवन के रास्ते तय किये। एआईएसएफ में रहते हुए उसने संगठन के लिए जम कर काम किया। यह वही समय था जब नौजवानों का कम्युनिस्ट आंदोलन से मोहभंग होने लगा था। संगठन में गुटबाजी, अराजकता और वैचारिक संकट गहराने लगे थे।
पटना कॉलेज में एआईएसएफ का सम्मेलन था। सम्मेलन में नयी कमिटी का गठन होना था। पदाधिकारियों का चयन होना था। हमलोगों ने जो पैनल तय किया था, उसे सर्वसम्मति से पास करना चाह रहे थे। पर दूसरे ग्रुप को मौजूदा लीडरशिप का पैनल स्वीकार नहीं था। जमकर बहस हुई। हो हंगामा होने लगा। कोई किसी की बात नहीं सुनना चाह रहा था। दोनों ग्रुप में मार-पीट की नौबत आ गयी। दूसरे ग्रुप ने सम्मेलन का बहिष्कार कर दिया। उनके विरोध के बावजूद मौजूदा लीडरशिप ने अपनी सूची पर मुहर लगाया। एआईएसएफ उसके बाद वर्षों तक दो खेमों में बंटा रहा। हालात ये थे कि लोग एक-दूसरे पर निजी स्तर पर वार करने लगे। उसकी प्रतिक्रिया में दूसरा खेमा खड़ा हुआ। अगर आप पार्टी लाईन से सहमत नहीं हैं तो संशोधनवादी या प्रतिक्रियावादी तक करार दिये जाते थे। वैचारिक टकराव के कारण सिरफुटौव्‍वल की नौबत आ जाती। लोग सीआईए के एजेंट तक घोषित किये जाते।
इन्हीं दिनों हम राणा से मिले। राणा बनर्जी से। लंबा सांवला चश्‍मे के भीतर झांकती बड़ी-बड़ी आंखें। पहली बार उसे नुक्कड़ पर गाते सुना – ओ गंगा तुमी बोए छे केनो। उसकी आवाज ऐसी थी जैसे शाम के आसमान पर सुलगते हुए सितारे। आम तौर पर वह जन गीत ही गाता था। वह गाता, हमारे बदन के रोयें सिहर जाते। जैसे सागर के रेतीले साहिलों पर आबसार झर रहे हों। कभी कभी हमलोग उससे फरमाईश करते – यार कुछ दूसरे गीत भी सुनाओ। हमेशा क्रांति ही करते रहते हो। वह हंसता और कहता लो सुनो – पागला हवा पागोल दीने पागल आमार मॉन नेचे उठे… हमारा मन भी नाच उठता।
इप्टा अगर हमारा काबा था, तो एआईएसएफ काशी। हमारा एक पांव इप्टा में तो एक पांव एआईएसएफ में। उन्हीं दिनों इप्टा का सम्मेलन हैदराबाद में तय हुआ। पटना से हम सब का जाना तय हुआ। जाने के लिए पैसे जुटाये गये। चंदा मांगने का सबसे कारगर तरीका था कि रंगकर्मियों की टोली गाते-बजाते सड़कों पर निकल जाती। ढोल, हारमोनियम, खंजरी और कुछ सुर वाले गायकों के साथ हम जैसे कुछ बेसुरे भी साथ देते। दिन भर सड़कों पर चंदा मांगते और शाम को नाटक का रिहर्सल। कुछ लोग थे जो दिल खोलकर चंदा देते। उसमें डॉ एके सेन, ब्रजकिशोर प्रसाद, हरि अनुग्रह नारायण और मेरे पिता भी शामिल थे। जबकि पापा के पास हमेशा पैसों की कमी रहती। कई बार घर चलाने के लिए पैसे नहीं होते, पर संगठन के लिए हमेशा उनका द्वार खुला रहता। इप्टा के सम्मेलन में हैरदराबाद के लिए पटना से बड़ी टीम का जाना तय हुआ, जिसमें लड़कियों की अच्छी संख्या थी। तनवीर अख्तर इप्टा के सचिव थे। उनकी मेहनत और लगन ने इप्टा को पुनर्जीवित किया था। संगठन में अनुशासन को काफी महत्व दिया जाता था। पर अनुशासन का सबसे बड़ा मसला लड़के और लड़कियों को लेकर ही रहता था। यह स्‍वाभाविक था कि जहां आग होगी, वहां धुआ होगा ही। इस कड़े अनुशासन के बावजूद प्रेम हिलोरें मारता। अपने लिए रास्ता खोज निकालता। जाने कितने दिल जुड़े और टूटे। प्रेम की नाकामियों और प्रेम की गाड़ी चल निकलने के हजारों किस्से हैं। हमारी गाड़ी प्लेटर्फाम पर लग गयी थी। उन दिनों लड़कियों के लिए विशेष कूपा हुआ करता था, जिसे लेडिज कूपा कहते थे। हमलोगों के लिए वही कूपा रिजर्व कराया गया था। पुष्पा दी हमारी टीम की लीडर थीं। इप्टा से लंबे समय से जुड़ी हुई थीं। इप्टा की गायन मंडली की सशक्‍त आवाज। उनको देखकर मशहूर अदाकारा बैजेंती माला की याद आती थी। उन्हें इस बात का एहसास था। उनको लेकर हम सब के मन में उत्सुकता बनी रहती। पुष्पा दी बिहार के जाने माने लॉयर ब्रजकिशोर प्रसाद की बेटी हैं। ब्रजकिशोर प्रसाद कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े थे। उनका पूरा परिवार कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए समर्पित था। उनकी बेटियां इप्टा में सक्रिय थीं। पुष्पा दी के निजी जीवन को लेकर लोगों की दिलचस्पी बनी रहती थी। हमारे समाज में महिलाएं अगर जिंदगी का रास्ता अकेले तय कर रही हो, तो उस पर सबकी निगाह रहती है। हमलोगों को पता था कि पुष्पा दी की शादी हुई थी, जो चल नहीं पायी और वे अलग हो गये। ट्रेन की लंबी यात्रा से एक फायदा हुआ कि हम एक-दूसरे के ज्यादा करीब आये। हमने जीवन के उन अनुभवों को साझा किया, जिसे शायद आम दिनों में बांटना संभव नहीं था। पुष्पा दी से उसी यात्रा में अतरंग होने का मौका मिला। उन्होंने अपने मन को खोल कर रख दिया। पहली बार हम जान पाये कि हमेशा खुश दिखने वाली पुष्पा दी अपने निजी जीवन में कितनी अकेली हैं।
हम लड़कियां अपने-अपने किस्से में मशगूल थे कि मुझे लड़कों ने आवाज दी। श्रीकांत, विनोद, अर्पूवानंद, परवेज अख्तर, जावेद समेत सभी बगल के डिब्बे में मजमा लगाये बैठे थे। गीत-संगीत का दौर जारी था। ये भी ज्यादती थी कि साथ सफर कर रहे हैं, पर अलग अलग। उनलोगों का भी मन हम सब के बिना नहीं लग रहा था। हम वहां पहुंचे ही थे कि तनवीर अख्तर आ गये। उन दिनों इप्टा के सचिव थे। उन्होंने मुझे देखते ही कहा, आप यहां क्या कर रहीं हैं? कुछ नहीं इनलोगों से गप कर रहे हैं। नहीं आप उठिए, जाइए यहां से। यहां आने की आपलोगों को इजाजत नहीं है। मुझे धक्का लगा। आंखें भर आयीं। पर किसी साथी में साहस नहीं था कि वे तनु भैया का विरोध कर पाते। मैं आंखें पोंछते हुए वापस लेडीज कूपे में चली गयी। हम सब लड़कियों ने तय किया कि अब हम इस कूपे से बाहर ही नहीं निकलेंगे।
बराबरी, समानता और वैचारिक आजादी के पक्ष में काम करने वाले संगठनों की पहली चुनौती थी, अपने भीतर बदलाव लाना। वे खुद अभी इसके लिए तैयार नहीं थे। स्त्री-पुरुषों के संबंधों को लेकर हमारा नजरिया तंग था। साथियों के भीतर सामंतवाद के अवशेष बचे हुए थे। सारे रास्ते लड़कियां खुद में मशगूल रहीं। लड़कों से परदेदारी की। तय किया कि हमलोग उनका बहिष्कार जारी रखेंगे। गाड़ी रुकी। स्‍टेशन पर कुछ साथी तख्ती हाथ में लिये स्वागत के लिए खड़े थे। हम एक कोने में खड़े हो गये। श्रीकांत पास आये। उसने कहा तुम नाराज क्यों हो? हमलोगों ने तो कुछ नहीं कहा। यूं भी यह नाराजगी ज्यादा देर टिकने वाली नहीं थी। दोस्तों के बिना कोई महफिल सजती कहां है? देश भर से इप्टा के कलाकार आये थे। पहली बार मैंने वहीं भूपेन हजारिका को देखा था। श्‍याम बेनेगल ने सम्मेलन का उद्धाटन किया था। उस समय के मशहूर अभिनेता फारुख शेख भी सम्मेलन में आये थे। वह इस कदर खूबसूरत थे कि हम सब देखते ही रह गये। कमबख्त क्‍या कयामत आंखें थीं और काले खूबसूरत बाल। रंग इतना गोरा की अगर छू दो तो मैले हो जाएं। उनको देख कर हम लड़कियों का दिल धड़कने लगा। हम फारुख की ओर बढ़े। हमलोग आपसे मिलना चाहते हैं! क्यों नहीं! कहां से हैं आपलोग? जी बिहार इप्टा से। ओह! अच्छी बात है आप लोगों से मिलकर खुशी हुई। फिर वे मंच पर जाकर बैठ गये। पूरा मैदान रौशनियों से नहाया हुआ था। लोग मैदान में अपनी जगह ले रहे थे। मंच पर अदाकार, उर्दू के शायर और गायन मंडली की टीम थी। पहला गाना बिहार इप्टा का था। पुष्पा दी ने कमान संभाली।
हम सब हिंदी हैं अपनी मंजिल एक है। ओ हो हो एक है…
दरअसल हमलोगों को स्टेज पर पहुंचने में देर हुई। हुआ यूं कि हम जहां ठहरे थे, वहां से लगभग चार किलोमीटर दूर एक खुले मैदान में मंच बनाया गया था। सभी लड़कियों को एक ऑटो पर बिठा दिया गया। ऑटो चालक को रास्ता बता दिया गया। हमलोग मस्ती में चले जा रहे थे। हैदराबाद की लंबी सड़कों का आनंद लेते हुए। काफी देर तक जब हमलोग चलते रहे, तब चिंता हुई कि अब तक वह जगह क्यों नहीं आयी है। हम लोगों ने ऑटो चालक से पूछना शुरू किया तो वह कुछ बता नहीं पा रहा था। वह न तो अंग्रजी समझता था न हिंदी। तब तक काफी अंधेरा हो चुका था। लड़कियां घबराने लगीं। रास्ता अंधेरा था और सड़क पर खामोशी पसरी हुई थी। हमलोग जितना पूछते, वह ऑटो चालक अपनी स्पीड बढ़ा देता। न वह हमारी भाषा समझ रहा था, न हम उसे कुछ समझा पा रहे थे। सभी लड़कियों के चेहरे के रंग उतर गये। कुछ तो घबराहट के मारे रोने लगीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। दूर दूर तक कोई बस्‍ती नहीं थी। सुनसान सड़क पर सिर्फ ऑटो की आवाज। मैंने किसी तरह उसे रोका और इशारे में समझाया कि वह गलत जा रहा है। पता नहीं क्या समझा, उसने टैंपो दूसरी दिशा की ओर मोड़ा। काफी जद्दोजहद के बाद हम कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे। हमलोग पहुंचे तो वहां मातम छाया हुआ था। हमारे साथी कह रहे थे कि जब तक हमारी लड़कियां वापस नहीं आतीं, हम कोई कार्यक्रम नहीं होने देंगे। नौबत पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने की आ गयी थी। हम सबको देखकर सबके चेहरे खिल गये। पर ऑटो वाले की शामत आ गयी। लड़कों ने उसे पीटना शुरू किया। किसी तरह उसको वहां से हटाया गया। बाद में पता चला कि उसने समझा ही नहीं कि हमें कहां जाना है।
जिंदगी के अनुभव सिर्फ रसीले नहीं होते। दुख व सुख के अनुभवों से ही जीवन पूर्ण होता है। इसकी खूबसूरती उसी में है। मैं वहां से दो चीजें लेकर आयी। हैदराबाद का मोती। दूसरा श्‍याम बेनगल के हाथों से लिखा एक कागज का पुर्जा। जिस पर उन्होंने लिखा – प्यारी निवेदिता के लिए।
ये भूली हुई यादें हैं, जिन पर वक्त की गर्द की गहरी पर्त जम गयी थी, अब उन्हें एक एक कर के याद कर रही हूं। कहानियां अलग-अलग हैं, मगर दिल में धंसा तीर अभी तक निकला नहीं है। रात तारों भरी है, जिसके बीच चांद पसरा हुआ है।
(निवेदिता के स्‍मृति-कोलाज का यह दूसरा हिस्‍सा है। पहले हिस्‍से में आपने पढ़ा था, चंद्रशेखर उर्फ चंदू की यादें: कुछ दुख होते हैं जिनके सामने सिर्फ पत्थर हुआ जा सकता है। यह अभी जारी है…)
(निवेदिता झा। वरिष्‍ठ पत्रकार। सामाजिक कार्यकर्ता। बरसों राष्‍ट्रीय सहारा और नई दुनिया से जुड़ी रहीं। महिला मुद्दों पर बेहतरीन पत्रकारिता के लिए उन्‍हें 2010-2011 का लाडली मीडिया अवार्ड मिला। उन्‍हें कई फेलोशिप भी मिल चुकी है। पटना में रह रहीं निवेदिता से niveditashakeel@gmail.com पर संपर्क करें।)

3 Responses to रात तारों भरी है, जिसके बीच चांद पसरा हुआ है

  1. ved prakash says:
    apki baten/anubhav ek rasta to dikhati hai lekin ek sajag admi bhi kahin na kanin galti kar baithta hai. comerade hon koi buri bat nahi. ap dekh hi rahi hongi ki rajniti hi nahi japitu culture evam literature ki bhi disha thik nahi hai. to jahan tak mai samaghta hun apki bat se ek rasta jarur niklna chahiye. padharkar accha laga. ved prakash 09936837945
  2. Manjari Srivastava says:
    निवेदिता दी, आपके स्मृति-कोलाज का यह हिस्सा जैसे मुझमे कहीं भीतर तक पैवस्त हो गया है. एक-एक शब्द ऐसा चित्र बना रहा है जैसे ये सब मेरे सामने ही गुज़र रहा हो. मुझे लग ही नहीं रहा कि मैं आपकी यादों से गुज़र रही हूँ. लग रहा है मैं भी तो हूँ इनमे कहीं न कहीं, जैसे ….गंगा किनारे, लंगरटोली में, काली मंदिर के मेले में और गांधी मैंदान में भी. मेरी भी यादों में तो समाया है यह सब…….मुझे भी मिलता था हर रोज़ कोई राणा बनर्जी जैसा कृष्णा घाट पर जब मैं जी.डी. एस गर्ल्स हॉस्टल में रहती थी.उसकी आवाज़ हमें रोज़ कृष्णा घाट तक खींच कर ले जाती.शायद मैं भी कभी उसके बारे में लिखती तो ऐसा ही लिखती जैसा आपने राणा के बारे में लिखा है – “इन्हीं दिनों हम राणा से मिले। राणा बनर्जी से। लंबा सांवला चश्‍मे के भीतर झांकती बड़ी-बड़ी आंखें। पहली बार उसे नुक्कड़ पर गाते सुना – ओ गंगा तुमी बोए छे केनो। उसकी आवाज ऐसी थी जैसे शाम के आसमान पर सुलगते हुए सितारे। आम तौर पर वह जन गीत ही गाता था। वह गाता, हमारे बदन के रोयें सिहर जाते। जैसे सागर के रेतीले साहिलों पर आबसार झर रहे हों। कभी कभी हमलोग उससे फरमाईश करते – यार कुछ दूसरे गीत भी सुनाओ। हमेशा क्रांति ही करते रहते हो। वह हंसता और कहता लो सुनो – पागला हवा पागोल दीने पागल आमार मॉन नेचे उठे… हमारा मन भी नाच उठता।” आपकी ही तरह सैद्धांतिक मतभेदों के बावजूद इंदिरा गांधी को मैं निजी तौर पर पसंद करती हूं। आपकी दोस्त शीरीं ने जो मास्को का चित्र खींचा है वह लाजवाब है. मेरे सपनों में भी ऐसा ही मास्को आता है. सोचा है कहीं जाऊं न जाऊं, ज़िन्दगी में एक बार मास्को ज़रूर जाऊंगी.कितना सही कहा है शीरीं जी ने -”मास्को एक खूबसूरत शहर है। वोल्गा नदी के किनारे।तुम्हें पता है मेरे कॉलेज से एक सीधी सड़क जाती है रेडस्कायर तक। जहां लेनिन चिर निद्रा में सोये हुए हैं। मैं उन्हें देखने गयी थी। देखकर मेरे बदन में झुरझुरी सी आने लगी। तुम सोच कर देखो, जिन्हें हम किस्से कहानियों में सुनते थे, उस आदमी को साबूत देखना। वह इतिहास का ऐसा अंश है, जिसे देखकर क्रांति में यकीन होने लगता है। जैसे हर क्रांति में अगली क्रांति का बीज छिपा हो। तुम्हें पता है सर्दियों में यह शहर बर्फीले पेड़ से भर जाता है। सामने वोल्गा बहती रहती है। अक्सर मैं वोल्गा की तारीक लहरों को देखती रहती हूं। रात गहरी हो गयी है। वोल्गा धीमे-धीमे बह रही है। तुम होती तो इस देश की खूबसूरती में खो जाती।” पुष्पा दी के बहाने आपने बिलकुल शै कहा है दी – “हमारे समाज में महिलाएं अगर जिंदगी का रास्ता अकेले तय कर रही हो, तो उस पर सबकी निगाह रहती है।” आज भी हमारा समाज वहीँ का वहीँ है. अकेली लड़कियों के बारे में उनकी सोच वही है. मैं महसूस करती हूँ क्योंकि अकेले अपना सफ़र तय कर रही हूँ. अभी कमरा शिफ्ट करने के चक्कर में इस मुसीबत से और दो-चार होना पड़ता है. आपकी यादों का कोलाज अद्भुत है दी. मुझे तो यह अपनी यादों का कोलाज लग रहा है. बहुत बधाई और शुक्रिया इस कोलाज को हम सबसे साझा करने के लिए. कोलाज के अगले हिस्से के इंतज़ार में ………
  3. niveditajha says:
    आप सभी दोस्तों का शुक्रिया। हौसला बढ़ाने का भी । मंजरी जीवन के अनुभव साझा ही हैं। हम एक दूसरे के भीतर उतरते है।
है

मंगलवार, 7 मई 2013

निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन के जहाँ 
चली है रस्म के कोई न सर उठाके चले 
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले 
नजर चुरा के चले जिस्म ओं जाँ बचा के चले ......फैज 

बुधवार, 6 मार्च 2013

avi tak khari istree



अभी तक ख्रडी स्त्री 
ग्रीषम फिर आ गया 
फिर हरे पत्तों  के बीच 
खड़ी है वह 
ओठ नम 
और भरा भरा सा चेहरा लिए 
बदली की रौशनी सी नीचे को  देखतीं 
निखरता रह 
उसे कवि न कह 
न हँस 
न रो 
कि वह 
अपनी व्येथा इस वर्ष भी नहीं जानती -----रघुवीर सहाय