अभी तक ख्रडी स्त्री
ग्रीषम फिर आ गया
फिर हरे पत्तों के बीच
खड़ी है वह
ओठ नम
और भरा भरा सा चेहरा लिए
बदली की रौशनी सी नीचे को देखतीं
निखरता रह
उसे कवि न कह
न हँस
न रो
कि वह
अपनी व्येथा इस वर्ष भी नहीं जानती -----रघुवीर सहाय
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