Khulaasman
मंगलवार, 7 मई 2013
निसार मैं तेरी गलियों के ए वतन के जहाँ
चली है रस्म के कोई न सर उठाके चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नजर चुरा के चले जिस्म ओं जाँ बचा के चले ......फैज
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