सोमवार, 12 मई 2014

मेरे राम

मेरे राम

मेरे साँवले रघुराई

रात गहरी हुयी

सफ़ेद पालों वाले नाव में
...
नाविक तुम्हारी राह देखते अभी अभी गये हैं

वे चकित हैं कि तुम्हारा नाम किसी युद्ध में

गरजने वाले बिगुल कि तरह बज रहा है

ये शहर लूटा लूटा सा है

तुम्हारे जिस्म पर फैली राख में

बादल बिखर- बिखर गये हैं

जो उगा है श्वेत कमल सा

वह रिस रहा है

बह रहा है गलियों में

तेजाब सा

ये वो शहर है जिसके

पश्चिम में डूबता है चाँद

जहाँ नदिया घेर लेती हैं बाजूबंद सी

जिसके किनारे जाने कितनी आरजूएं

जगमगा रही हैं

आज फिर से लंका दांत निकले हंस रह है

तुम्हारे नील बदन पर साँप सा रेंग रहा है

कमल

तुम अभी भी पड़े हो निशब्द

मेरे राम

मंदिरो की सीढ़ियों पर सुर्ख गुलाब सा

जो दहक रहा है

वह पूजा में चढ़ाये फूल नहीं है

वो मैं ही हूँ

इस जमीन पर रक्त बीज की

तरह उग आती हूँ

जहाँ जहाँ बहेगा तेजाब

फैल जाऊगीं

अमर बूटियों कि तरह ...nivedita

2 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया संवाद कविता .. मैं इस कविता को उसी ख़ास समूह में रखूँगा जिसमें देवीप्रसाद की मुसलमान या कैफ़ी आजमी की अयोध्या है ..

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