सोमवार, 10 मार्च 2014

 बसे रहो मेरे प्रेम
एक समुद्र मेरे भीतर उतरा
एक नदी बहने लगी धीरे धीरे
आसमान के जितने रंग थे
सब उतर आये
शरद का चाँद कई बार पिघला
मेरे जिस्म पर उग आये प्यार के नर्म घास
मेरी उम्र से ही नह‍ीं
मेरे कई जन्मों से भी बड़ा है प्रेम
उन सभी हसीन चीज़ों से जिससे दुनिया बनी
और उस खुदा से भी...
जिसके होने का दंभ उससे बड़ा है
प्रेम करना उतना ही सहज है
जितना जिंदगी का होना
जितना पृथ्वी का होना
समुद्रों,नदियों और असंख्य तारों का होना
ओ हरीतिमा
ओ नीलिमा
ओ लालिमा
ओ मेरे प्रेम बसे रहो बसे रहो ....... निवेदिता

1 टिप्पणी:

  1. " .......आसमान के जितने रंग थे
    सब उतर आये
    शरद का चाँद कई बार पिघला
    मेरे जिस्म पर उग आये प्यार के नर्म घास ...... "

    अच्छी कविता है।
    इस पंक्ति को इस तरह लिखें --
    'मेरे जिस्म पर उग आयी प्यार की नर्म घास'

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